कुछ गाने कहानी से निकलकर सीधे दिल तक पहुंचते हैं और ‘रांझा रांझा' उन्हीं में से एक है. साल 2010 में आई मणि रत्नम की फिल्म ‘रावण' के इस गाने में प्यार और समर्पण का ऐसा रंग दिखाई देता है, जो आज भी याद रह जाता है. ऐश्वर्या राय बच्चन के एक्सप्रेशन, ए.आर. रहमान का संगीत और गुलजार के शब्दों ने इसे खास बना दिया. गाने की शुरुआत सूफी संत और कवि बुल्ले शाह की मशहूर रचना ‘रांझा रांझा करदी नी, मैं आपे रांझा होई' से प्रेरित है. इसे रेखा भारद्वाज और जावेद अली ने आवाज दी है.
बुल्ले शाह की रचना से लिया गया है मुखड़ा
‘रांझा रांझा' की सबसे खास बात इसकी शुरुआत है. गाने की शुरुआती पंक्तियां बुल्ले शाह की मशहूर सूफी रचना ‘रांझा रांझा करदी नी' से ली गई हैं. इस रचना में प्रेमी और प्रेमिका के बीच का रिश्ता सिर्फ प्रेम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रेम में खुद को पूरी तरह खो देने की भावना सामने आती है. फिल्म के लिए इन पंक्तियों को गुलजार ने आगे के बोलों के साथ जोड़ा और एआर रहमान ने इसे सूफी रंग दिया.
ऐश्वर्या के एक्सप्रेशन ने बढ़ाया गाने का असर
‘रांझा रांझा' को फिल्म में पारंपरिक डांस नंबर की तरह इस्तेमाल नहीं किया गया. यह मुख्य रूप से बैकग्राउंड में सुनाई देता है और कहानी के माहौल को आगे बढ़ाता है. गाने में ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन नजर आते हैं. ऐश्वर्या के चेहरे के एक्सप्रेशन और उनकी स्क्रीन प्रेजेंस गाने के सूफी एहसास के साथ खूब मेल खाते हैं. ‘रावण' में ऐश्वर्या ने रागिनी का किरदार निभाया था, जबकि अभिषेक बच्चन बीरा मुंडा की भूमिका में थे और विक्रम पुलिस अधिकारी देव प्रताप शर्मा बने थे. गोविंदा, रवि किशन और प्रियामणि भी फिल्म का हिस्सा थे.
रहमान, गुलजार और मणि रत्नम की अनोखी जोड़ी
‘रावण' का संगीत ए.आर. रहमान ने तैयार किया था और हिंदी वर्जन के सभी गीतों के बोल गुलजार ने लिखे थे. एल्बम में ‘बहने दे', ‘खिली रे', ‘कटा कटा' और ‘ठोक दे किल्ली' जैसे गाने भी शामिल थे. ‘रांझा रांझा' को खास तौर पर सूफी रंग वाले गीत के रूप में तैयार किया गया था. इसका म्यूजिक एल्बम अप्रैल 2010 में रिलीज हुआ था.
फिल्म ‘रावण' 17 जून 2010 को रिलीज हुई थी. यह रामायण से प्रेरित आधुनिक कहानी थी और हिंदी के साथ तमिल में भी बनाई गई थी. फिल्म में बड़े सितारे और मणि रत्नम-रहमान की जोड़ी होने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर इसका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा. हालांकि फिल्म की कहानी को लेकर अलग-अलग राय रही, लेकिन इसके संगीत ने अपनी अलग पहचान बनाई.
आज 16 साल बाद भी ‘रांझा रांझा' को याद किया जाता है तो इसकी वजह सिर्फ फिल्म नहीं, बल्कि बुल्ले शाह की सदियों पुरानी सूफी सोच, गुलजार के शब्द, रहमान का संगीत और रेखा-जावेद की आवाज का वह मेल है, जिसने इस गीत को एक अलग एहसास दे दिया.
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