तेल की दौलत से तबाही तक: कभी दुनिया के सबसे अमीर देशों में शुमार वेनेजुएला कैसे बर्बाद हो गया?

एक समय चीन से 12 गुना अमीर देश रहा वेनेजुएला कैसे बर्बादी की कगार पर पहुंचा? तेल से हासिल अकूत दौलत, पर एक ही आय पर निर्भरता की गलत नीति, कमजोर संस्थाएं और गलत राजनीतिक फैसलों ने कैसे एक समृद्ध देश को तबाह कर दिया - पढ़िए पूरी कहानी.

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  • वेनेजुएला 1970 के दशक में दुनिया के टॉप 20 अमीर देशों में शुमार था, काराकास लैटिन अमेरिका का पेरिस कहा जाता था
  • तब यह चिली से दोगुना, जापान से चार गुना और चीन से 12 गुना अमीर था. बोलिवर मजबूत थी, विदेशी निवेश की भरमार थी.
  • तेल ने वेनेजुएला को अमीर बनाया, लेकिन गलत और अदूरदर्शी राजनीतिक फैसलों ने उसी तेल को उसके पतन की वजह बना दिया.
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राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को नाटकीय अंदाज में राष्ट्रपति भवन से अमेरिका के गिरफ्तार करने से चर्चा में आए वेनेजुएला का नाम जब भी आता है, तो दिमाग में महंगाई, भूख, पलायन और राजनीतिक संकट की तस्वीर उभरती है. लेकिन यह वही देश है जो 1970 के दशक में दुनिया के शीर्ष 20 सबसे अमीर देशों में शुमार था. उस दिनों वेनेजुएला की प्रति व्यक्ति आय कई यूरोपीय देशों से अधिक थी. राजधानी काराकास को लैटिन अमेरिका का पेरिस कहा जाता था. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले वेनेजुएला की मुद्रा बोलिवर मजबूत थी और देश में विदेशी निवेश की भरमार थी.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक 1950 में जब पूरी दुनिया दूसरे विश्व युद्ध से उबरने के लिए संघर्ष कर रही थी तब जीडीपी के लिहाज से वेनेजुएला दुनिया का चौथा सबसे अमीर देश था. तब यह देश चिली से दोगुना, जापान से चार गुना और चीन से 12 गुना अमीर था. ऐसे में सवाल यह है कि फिर ऐसा क्या हुआ कि कुछ ही दशकों में यह समृद्ध देश पूरी तरह चरमरा गया. इस सवाल का जवाब सिर्फ निकोलस मादुरो या उनके पहले राष्ट्रपति रहे ह्यूगो चावेज की नाकामियों में नहीं छिपा है. असली कहानी उससे कहीं पहले शुरू होती है, जब तेल ने वेनेजुएला को अमीर बनाया और वही तेल बाद में उसके पतन की सबसे बड़ी वजह बन गया.

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तेल ने बनाया अमीर, लेकिन कमजोर भी

बीसवीं सदी की शुरुआत में जब वेनेजुएला में विशाल तेल भंडार मिले, तो देश की किस्मत अचानक बदल गई. 1920 से लेकर 1970 तक तेल निर्यात से इतनी कमाई हुई कि सरकार के पास पैसों की कमी नहीं रही. सड़कों, इमारतों, स्कूलों और सरकारी योजनाओं पर खुलकर खर्च हुआ. लेकिन इसी दौर में एक खतरनाक गलती भी हुई. देश की पूरी अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे सिर्फ तेल पर टिकती चली गई.

सरकार को लगा कि जब तेल से इतना पैसा आ रहा है, तो खेती, उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग पर मेहनत करने की जरूरत ही क्या है. नतीजा यह हुआ कि दूसरे सेक्टर कमजोर होते चले गए. इसे अर्थशास्त्र में “डच बीमारी” कहा जाता है, जब किसी एक प्राकृतिक संसाधन की वजह से बाकी अर्थव्यवस्था बीमार हो जाती है. वेनेजुएला के साथ भी यही हुआ.

तेल की कमाई आसान थी, लेकिन अस्थिर थी. जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरतीं, पूरे देश की कमाई हिल जाती. इसके बावजूद सरकार ने खर्च कम करने के बजाय और अधिक खर्च करना शुरू कर दिया.

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बढ़ता खर्च, बढ़ता कर्ज और गलत फैसले

1970 के दशक के आखिर में जब तेल की कीमतों में गिरावट शुरू हुई, तब वेनेजुएला सरकार के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया. लेकिन सरकार ने सख्त फैसले लेने के बजाय विदेशी कर्ज लेना शुरू कर दिया. सरकारी खर्च पहले जैसा ही चलता रहा. सब्सिडी, सरकारी नौकरियां और लोकलुभावन योजनाएं जारी रहीं.

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1983 में (18 फरवरी का) वह दिन आया जिसे वेनेजुएला आज भी वियरनेस नेग्रो (ब्लैक फ्राइडे) के नाम से याद करता है. उस दिन सरकार को अपनी मुद्रा का अवमूल्यन (यानी मूल्य में कमी) करना पड़ा. बोलिवर की कीमत एक झटके में गिर गई. लोगों की बचत आधी हो गई और सरकार पर लोगों का भरोसा टूटना शुरू हो गया. यही वह मोड़ था, जहां से आर्थिक गिरावट साफ दिखाई देने लगी.

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लोकतंत्र था, लेकिन संस्थाएं कमजोर थीं

यह कहना आसान होता है कि वेनेजुएला तानाशाही की वजह से बर्बाद हुआ, लेकिन सच्चाई यह है कि लंबे समय तक वहां लोकतांत्रिक सरकारें रहीं. समस्या यह थी कि संस्थाएं मजबूत नहीं थीं. भ्रष्टाचार धीरे-धीरे सिस्टम में घुसता गया. राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आने के बाद सुधार करने के बजाय संसाधनों के बंटवारे में उलझ गईं.

सरकारें तेल के पैसों से असंतोष को दबाने की कोशिश करती रहीं, लेकिन जैसे-जैसे पैसा कम होता गया, जनता का गुस्सा बढ़ता गया. 27 फरवरी 1989 को गुआरेनास शहर से शुरू हुआ दंगा राजधानी काराकास तक फैल गया. इसे ‘काराकाजो' नाम से याद किया जाता है. दंगे और विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से सरकार के आर्थिक सुधारों और उसके कारण गैसोलीन और ट्रांसपोर्ट की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के जवाब में शुरू हुए. दंगे में करीब 2000 लोगों के मारे जाने का दावा किया गया तो करीब 212 मिलियन डॉलर (करीब 2000 करोड़ रुपये) का नुकसान हुआ. ये दंगा साफ संकेत था कि देश अंदर से टूट रहा है.

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1990 का दशक और बैंकिंग तबाही

पांच साल बाद 1994 में वेनेजुएला को एक और झटका लगा, जब देश की बैंकिंग व्यवस्था ढहने लगी. कई बड़े बैंक दिवालिया हो गए. सरकार ने उन्हें बचाने के लिए अरबों डॉलर झोंक दिए. इससे सरकारी खजाना और खाली हो गया. आम जनता पर टैक्स और महंगाई का बोझ बढ़ता गया.
इस दौर तक वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था न तेल के सहारे चल पा रही थी, न ही बाकी सेक्टर मजबूत थे. बेरोजगारी बढ़ रही थी और लोगों का भरोसा लोकतंत्र से उठता जा रहा था.

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चावेज का उदय: उम्मीद और भ्रम

इसी माहौल में ह्यूगो चावेज सत्ता में आए. उन्होंने खुद को सिस्टम के खिलाफ लड़ने वाला नेता बताया. गरीबों को लगा कि अब उनकी सुनी जाएगी. शुरुआत में ऊंची तेल कीमतों ने चावेज को बड़ी राहत दी. उन्होंने सामाजिक योजनाओं पर जमकर खर्च किया. लेकिन समस्या यह थी कि चावेज सरकार ने भी वही गलती दोहराई, जो पहले की सरकारें करती आई थीं. अर्थव्यवस्था को विविध बनाने के बजाय पूरा जोर नियंत्रण और राष्ट्रीयकरण पर लगाया गया. सरकारी तेल कंपनी पेट्रोलियोस डी वेनेजुएला (पीडीवीएसए) में तकनीकी विशेषज्ञों की जगह राजनीतिक लोगों को बैठाया गया. इससे उत्पादन गिरने लगा.

नियंत्रण, डर और निवेश का पलायन

मुद्रा नियंत्रण, कीमत नियंत्रण और सख्त सरकारी हस्तक्षेप ने निजी निवेशकों को डरा दिया. विदेशी कंपनियां देश छोड़ने लगीं. लोकल बिजनेस बंद होने लगे. सरकार ने घाटा पूरा करने के लिए पैसा छापना शुरू कर दिया. यहीं से हाइपरइन्फ्लेशन की शुरुआत हुई. लोगों की सैलरी बेकार होने लगी. दुकानों में सामान नहीं मिलता था, क्योंकि कीमत तय थी लेकिन लागत उससे कहीं अधिक थी.

तेल गिरा, व्यवस्था ढह गई

2014 के बाद जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरीं, तो वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई. सरकार के पास न विदेशी मुद्रा थी, न भरोसेमंद उत्पादन. नतीजा यह हुआ कि देश में इतिहास की सबसे भयानक आर्थिक गिरावट आई. लाखों लोग देश छोड़कर भागने लगे.

2014 के बाद: जब वेनेजुएला पूरी तरह टूट गया

2014 के बाद का दौर वेनेजुएला के इतिहास का सबसे अंधकारमय अध्याय माना जाता है. यह वह समय था जब जो आर्थिक ढांचा पहले से कमजोर हो चुका था, वह पूरी तरह टूट गया. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक गिर गईं और क्योंकि वेनेजुएला की पूरी अर्थव्यवस्था तेल पर टिकी हुई थी, इसलिए सरकार की आमदनी एक झटके में सूखने लगी.

तेल की कीमत गिरते ही वेनेजुएला सरकार के पास न तो विदेशी मुद्रा बची, न ही आय के दूसरे स्रोत थे. वर्षों से चले आ रहे मुद्रा नियंत्रण और आयात निर्भरता की वजह से देश खुद अपने लोगों के लिए जरूरी सामान तक नहीं बना पा रहा था. खाने-पीने की चीजें, दवाइयां, ईंधन और यहां तक कि टॉयलेट पेपर जैसी बुनियादी वस्तुएं भी दुकानों से गायब होने लगीं.

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हाइपरइन्फ्लेशन से वेनेजुएला चरमराया

इस हालात से निपटने के लिए सरकार ने जो रास्ता चुना, वही सबसे विनाशकारी साबित हुआ. सरकार ने खर्च कम करने या आर्थिक सुधार करने के बजाय बड़े पैमाने पर नोट छापने शुरू कर दिए. इसका नतीजा यह हुआ कि महंगाई नियंत्रण से बाहर हो गई और कुछ ही वर्षों में वेनेजुएला दुनिया के इतिहास की सबसे भयानक हाइपरइन्फ्लेशन की चपेट में आ गया. लोगों की महीने भर की सैलरी कुछ दिनों में बेकार हो जाती थी. हालात ऐसे हो गए कि लोग बैग में नोट भरकर बाजार जाते थे, फिर भी खाने का सामान नहीं खरीद पाते थे.

सरकारी तेल कंपनी पेट्रोलियोस डी वेनेजुएला (पीडीवीएसए) की हालत भी बद से बदतर होती चली गई. राजनीतिक दखल, भ्रष्टाचार और तकनीकी विशेषज्ञों की कमी ने तेल उत्पादन को लगभग आधा कर दिया. जिस तेल पर देश टिका था, वही तेल अब निकल ही नहीं पा रहा था. मशीनें खराब थीं, रिफाइनरी बंद पड़ी थीं और अनुभवी कर्मचारी देश छोड़ चुके थे.

2013 में हेगो चावेज की मौत के बाद सत्ता संभालने वाले निकोलस मादुरो के सामने संकट संभालने की चुनौती थी, लेकिन उनकी सरकार आर्थिक मोर्चे पर कोई ठोस समाधान नहीं दे पाई. उल्टा, सत्ता बचाने के लिए राजनीतिक दमन बढ़ता गया. विरोध प्रदर्शनों को कुचला गया, विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया और संस्थाओं की स्वतंत्रता खत्म होती चली गई.

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हाथ से छूटती गई अर्थव्यवस्था

जैसे-जैसे हालात बिगड़ते गए, वैसे-वैसे आम लोगों का जीवन असहनीय होता गया. अस्पतालों में दवाइयां नहीं थीं, स्कूल बंद होने लगे और अपराध तेजी से बढ़ा. हालात इतने खराब हो गए कि लाखों लोग देश छोड़कर कोलंबिया, ब्राजील, पेरू और अन्य देशों की ओर पलायन करने लगे. यह लैटिन अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट बन गया.

2018 के बाद सरकार ने मुद्रा से कई बार शून्य हटाए, नई करेंसी लाई, लेकिन इससे हालात नहीं बदले. लोगों का भरोसा सिस्टम से पूरी तरह टूट चुका था. वेनेजुएला में अर्थव्यवस्था अब कागजी नहीं, बल्कि डॉलर और बार्टर सिस्टम पर चलने लगी.

2020 के बाद कुछ सीमित सुधार जरूर दिखे, जैसे अनऑफिशियल डॉलराइजेशन और कुछ निजी कारोबारों को राहत, लेकिन यह सुधार आम जनता तक नहीं पहुंच पाए. देश की बड़ी आबादी आज भी गरीबी, असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य के साथ जी रही है.

2014 के बाद की वेनेजुएला की कहानी यह दिखाती है कि जब किसी देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह एक संसाधन पर निर्भर हो, संस्थाएं कमजोर हों और संकट के समय सुधार के बजाय नियंत्रण को चुना जाए, तो पतन सिर्फ आर्थिक नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और मानवीय त्रासदी में बदल जाता है. यह सिर्फ एक देश की कहानी नहीं बल्कि चेतावनी है कि प्राकृतिक संसाधन अगर समझदारी से न संभाले जाएं, तो वरदान अभिशाप बन सकते हैं. तेल ने वेनेजुएला को अमीर बनाया, लेकिन गलत नीतियों, कमजोर संस्थाओं और अदूरदर्शी राजनीति ने उसी तेल को उसके पतन की वजह बना दिया.

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