नई जनरेशन का अटेंशन स्पैन इतना कम क्यों हो गया है? क्यो जेन-जी इतनी बेचैन है? उन्हें हर चीज तुरंत क्यों चाहिए? इसे लेकर जावेद जाफरी ने अपने बेटे के साथ अपना दिलचस्प एक्सपिरियंस शेयर किया है. जावेद जाफरी ने अपने बेटे का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने उससे कहा कि बैठकर सनसेट देखो. लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उनके घर की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है. जावेद के मुताबिक आज की पीढ़ी लगातार बदलते फ्रेम और तेज कंटेंट के बीच बड़ी हुई है, जबकि असली जिंदगी की रफ्तार उससे बिल्कुल अलग है. यही वजह है कि कई बच्चों का पेशंस लेवल पहले के मुकाबले काफी कम होता जा रहा है.
बच्चों का दिमाग लगातार 30 फ्रेम देख रहा है-
जावेद जाफरी ने कहा कि छोटा बेटा और उसकी पूरी जनरेशन आईपैड और डिजिटल स्क्रीन के साथ बड़ी हुई है. ऐसे में उनका दिमाग लगातार बदलते विजुअल्स और मूवमेंट देखने का आदी हो चुका है. आज के बच्चे हर समय स्क्रीन पर चलने वाला कंटेंट देख रहे हैं. उनके मुताबिक इस जनरेशन का दिमाग लगातार 24 से 30 फ्रेम कंज्यूम कर रहा है. लेकिन रियल लाइफ ऐसी नहीं होती. असली जिंदगी में हर सेकंड कुछ नया नहीं होता. कई बार चीजें धीरे-धीरे होती हैं. लेकिन जो दिमाग लगातार तेज गति वाले कंटेंट का आदी हो चुका हो, उसे रियल लाइफ का वह एक फ्रेम भी ठहरा हुआ लग सकता है.
बड़े बेटे और छोटे बेटे में दिखा फर्क-
जावेद जाफरी ने कहा कि यह फर्क उन्हें अपने ही घर में दिखाई देता है. उनके मुताबिक उनके बड़े बेटे के साथ यह समस्या कम है, क्योंकि वह उस दौर में बड़ा हुआ जब स्क्रीन और गैजेट्स का असर आज जितना नहीं था. वहीं छोटा बेटा बचपन से ही डिजिटल डिवाइसेज के बीच बड़ा हुआ है. इसी वजह से दोनों की आदतों और पेशंस लेवल में फर्क दिखाई देता है.
हर चीज अभी चाहिए-
जावेद का मानना है कि इसी वजह से आज की पीढ़ी हर चीज तुरंत चाहती है. इस पीढ़ी में धीरे-धीरे इंतजार करने की आदत कम होती जा रही है. चाहे एंटरटेनमेंट हो, जानकारी हो या रोजमर्रा की दूसरी चीजें, लोग अब सब कुछ जल्दी और तुरंत चाहते हैं.
ये समस्या किसी एक बच्चे, घर, परिवार की समस्या नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में ये समस्या काफी बढ़ गई है. गैटेट्स से घिरे हुए नई जनरेशन के लोगों में इसीलिए धैर्य और शांति काफी कम हो गई है. अब इस समस्या का हल क्या है इसका सही जवाब भले ही अभी किसी के पास न हो, लेकिन जावेद जाफरी की इस बात को सुनकर काफी लोग शायद ये सोचेंगे कि आखिरी बार उन्होंने बिना फोन के शांति के साथ बैठकर डूबता हुआ सूरज कब देखा था?
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