Cooking Gas From Waste: देश में एलपीजी की किल्लत को लेकर लोग परेशान हैं. गैस सिलेंडर न मिल पाने की खबरें कई जगहों से आ रही है. इसी बीच पुणे से एक खबर आई जो चर्चा का विषय बन गई.के एक इंजीनियर ने किचन के कचरे से घर पर ही कुकिंग बना डाली. भारत के ज्यादातर घरों में हर दिन रसोई से निकलने वाला कचरा, सब्जियों के छिलके, बचा हुआ खाना, फलों के छिलके और खराब खाने पीने की चीजें सीधे कूड़ेदान में चला जाता है. कुछ घंटों बाद यह कचरा शहर के बड़े लैंडफिल में पहुंचता है, जहां यह सड़कर मीथेन और अन्य हानिकारक गैसें पैदा करता है. दूसरी तरफ, रसोई में खाना बनाने के लिए हम तेजी से महंगे होते LPG सिलेंडर पर निर्भर होते जा रहे हैं. ऐसे समय में पुणे के एक इंजीनियर ने एक दिलचस्प सवाल उठाया क्या वही किचन वेस्ट, जिसे हम फेंक देते हैं, हमारे घर की कुकिंग गैस बन सकता है? इसी सवाल ने एक ऐसे अनोखे प्रयोग को जन्म दिया, जिसने कचरे को गैस में बदलने का नया रास्ता दिखाया.
रसोई में छिपा एक बड़ा सवाल
पुणे के इंजीनियर प्रियदर्शन सहस्रबुद्धे ने इस समस्या पर तब ध्यान दिया जब उन्होंने घर में रोजाना फेंके जाने वाले खाने को देखा. शुरुआत में उन्होंने कचरे को कम करने के लिए कम्पोस्टिंग का प्रयोग किया, लेकिन उन्हें लगा कि जैविक कचरे में इससे भी ज्यादा संभावनाएं छिपी हैं. उन्हें लगा कि अगर इस कचरे को सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह सिर्फ खाद ही नहीं, बल्कि एनर्जी का भी स्रोत बन सकता है.

जब खाने के बचे टुकड़ों से बनने लगी गैस
रिसर्च के दौरान उन्हें पता चला कि जैविक कचरे को बैक्टीरिया की मदद से तोड़ने पर मीथेन गैस बनती है. इस प्रक्रिया को एनेरोबिक डाइजेशन कहा जाता है. मीथेन वही गैस है जिसका इस्तेमाल बायोगैस प्लांट में खाना बनाने के लिए किया जाता है. यही विचार आगे चलकर वायु नाम के एक छोटे घरेलू बायोगैस सिस्टम में बदल गया. इस मशीन में रोजाना किचन का कचरा डाला जाता है और कुछ समय बाद उससे बनने वाली गैस को सीधे गैस स्टोव तक पहुंचाया जा सकता है. बचा हुआ लिक्विड पौधों के लिए बेहतरीन जैविक खाद बन जाता है.
घर में किया गया प्रयोग हुआ सफल
प्रियदर्शन ने सबसे पहले इस सिस्टम को अपने घर में लगाया. रोजाना घर से निकलने वाले खाने के अवशेष मशीन में डाले जाने लगे. कुछ समय बाद सिस्टम प्रतिदिन लगभग 800 लीटर बायोगैस पैदा करने लगा.
यह गैस उनके घर की खाना बनाने की जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा करने लगी. इसका सीधा असर यह हुआ कि उनके परिवार की LPG सिलेंडर पर निर्भरता काफी कम हो गई और हर साल कई सिलेंडर की बचत होने लगी.

पड़ोसियों को समझाना था सबसे मुश्किल काम
तकनीक बनाना आसान था, लेकिन लोगों की आदतें बदलना सबसे बड़ी चुनौती थी. प्रियदर्शन ने अपने अपार्टमेंट के हर घर में जाकर लोगों को समझाया कि कचरे को अलग-अलग करना क्यों जरूरी है. कई बार वे खुद भी घर-घर जाकर ऑर्गेनिक वेस्ट इकट्ठा करते थे.
धीरे-धीरे लोगों की जिज्ञासा बढ़ने लगी. जब पड़ोसियों ने देखा कि उनके घर का कचरा सचमुच गैस में बदल रहा है, तो उन्होंने भी सहयोग करना शुरू कर दिया. आज आसपास के घर मिलकर रोजाना 8-10 किलो जैविक कचरा इस सिस्टम को देते हैं.

एक प्रयोग से शुरू हुआ बड़ा अभियान
जो प्रयोग एक घर से शुरू हुआ था, वह अब कई शहरों तक पहुंच चुका है. प्रियदर्शन के स्टार्टअप ने पुणे, नासिक, हैदराबाद और औरंगाबाद जैसे शहरों में 100 से ज्यादा वायु बायोगैस यूनिट लगाए हैं.
ये यूनिट मिलकर रोजाना लगभग दो टन किचन वेस्ट को प्रोसेस करते हैं और सैकड़ों LPG सिलेंडर की खपत कम करने में मदद कर रहे हैं. साथ ही वायु मित्र नाम का एक ग्रुप भी बनाया गया है, जहां लोग टिकाऊ लाइफस्टाइल और कचरा मैनेजमेंट के बारे में सीखते हैं.
कचरा नहीं, कीमती रिसॉर्स
भारत में बढ़ते लैंडफिल और प्रदूषण के बीच यह पहल एक अहम संदेश देती है. किचन वेस्ट सिर्फ कचरा नहीं, बल्कि एक कीमती संसाधन है. अगर हर घर थोड़ी समझदारी से जैविक कचरे का उपयोग करे, तो यह न केवल पर्यावरण को बचा सकता है बल्कि रसोई के लिए एक वैकल्पिक फ्यूल भी बन सकता है.
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