Rajbhog: इन दिनों आईपीएल सीजन चल रहा है, हाल ही में एक मैच में वैभव सूर्यवंशी ने हाफ सेंचुरी लगाई और बोला कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैं राजभोग खाकर आया था. उनका ये बयान सुनकर मुझे हंसी तो आई ही लेकिन इसके साथ ही मैं अपने बचपन की उन यादों में चली गई जब राजभोग, रसगुल्ला, रसमलाई और छेना सब एक ही हुआ करता था. मैं उनमें कोई भेदभाव नहीं करती थी. हर किसी को उतने ही प्यार से और उतने ही मन से खाती थी. हर एक रसगुल्ले की बाइट पर एक अलग ही सुकून मिलता था और मन खुशियों के उन झरोकों में चला जाता था जिसमें आज कई कोशिशों के बाद भी नहीं जाया जाता है.
एक बर्थडे पार्टी और राजभोग से पहली मुलाकात
सच कहूं तो मुझे हमेशा से मिठाइयों का शौक रहा है, लेकिन राजभोग, रसमलाई, छेना ( सफेद रसगुल्ला) हो या फिर रसभरी इन सबमें क्या फर्क होता है वो बड़े होने के बाद पता लगा. इन सभी के साथ एक बचपन का किस्सा याद आ गया सोचा आज इस डायरी में आपके साथ इसको बांट लूं तो शायद फिर से उन बचपन के गलियारों में जाने का मौका मिल जाए. हमारे मोहल्ले में एक छोटी-सी बर्थडे पार्टी थी. मेरी प्लेट में भी एक मिठाई थी जो दिखने में बेहद स्वादिष्ट लग रही थी ( आज पता लगा कि वो राजभोग था), प्लेट में इसके साथ ही केक का एक टुकड़ा था, कुछ टॉफी थी, समोसे के साथ नमकीन भी आंटी ने परोसी थी. लेकिन इन सबके बीच मुझे जो चीज सबसे ज्यादा पसंद आ रही थी वो थी वो सफेद चाशनी में डूबी हुई मिठाई थी, जिसे आज हम राजभोग के नाम से जानते हैं. वहीं केक भी इसलिए मैं इस उधेड़ बुन में लगी थी कि आखिर पहले खाएं किसे.
जब हर मिठाई एक जैसी लगती थी, बचपन के वो दिन
तभी इस समस्या का हल वहीं मेरे साथ बैठे एक दोस्त ने दिया जिसमे कुछ पल पहले ही अपनी प्लेट से उस चाशनी चपटती मिठाई को खाया था और मेरी तरफ इशारा करके बोला पहले राजभोग खा...बाकि चीजें घर ले चलेंगे. इसका एक कारण ये भी था कि चाशनी की वजह से प्लेट में रखी बाकी चीजें खराब हो जाती. हालांकि तब मुझे इसका नाम नहीं पता था मुझे ये बाकी चाशनी वाली मिठाइयों जैसा ही लगता था. लेकिन जैसे ही मैने उसका पहला कौर लिया, मुझे लगा जैसे मैं सच में कोई राजा हूं. नरम, रसीला, केसर की खुशबू से भरा हुआ राजभोग सिर्फ मिठाई नहीं, एक एहसास था.
बड़े होकर समझ आया- राजभोग आखिर है क्या
आज जब मैं उस राजभोग को खाती हूं तो मुझे समझ आता है कि आखिर इसको ये नाम क्यों दिया गया है. क्योंकि इसको खाकर समझ आता है कि इसे खाने के बाद मुझे राजा जैसी फीलिंग आती है. अब मन में सवाल आता है कि आखिर इसका नाम राजभोग पड़ा क्यों. इसको पहले किसने बनाया था. तो चलिए अब एक नजर डालते हैं राजभोग के इतिहास पर और उसकी ऐसी कहानी जो आपके जहन में भी ऐसी उतरेगी की आप इसे जब भी खाएंगे तो सामने वाले से इसके इतिहास के बारे में पूछेंगे जरूर.
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राज भोग का इतिहास
जब बाद में मैंने पढ़ा और मैंने इसके बारे में जानना शुरू किया. पता चला कि राजभोग असल में बंगाल की प्रसिद्ध मिठाई है, जो रसगुल्ले का ही एक रॉयल वर्जन मानी जाती है. लेकिन, इसमें खास बात यह है कि इसके अंदर ड्राई फ्रूट्स की स्टफिंग होती है और इसमें केसर मिलाया जाता है, जिससे इसका रंग हल्का पीला और स्वाद बेहद शाही हो जाता है. राजभोग का शाब्दिक अर्थ "शाही दावत" है, जो वास्तव में मिठाई और उसके स्वाद को परिभाषित करता है.
क्यों कहा जाता है इसे ‘राजाओं की मिठाई'
राजभोग पनीर, केसर, इलायची और दूसरे सुगंधित मसालों के नाजुक मिश्रण से तैयार किया जाता है, इतिहास को जब मैने थोड़ा और खंगाला तो पता लगा कि पुराने समय में ये राजाओं और बड़े जमींदारों के लिए बनाया जाता था. शायद इसलिए इसका नाम भी राजभोग पड़ा, यानि राजा का भोजन. अब तो हर खास मौके पर मैं खुद के लिए राजभोग जरूर लाती हूं, चाहे कोई छोटी सफलता हो या बस खुद को खुश करने का मन हो.
आज के दौर में राजभोग- हर खुशी का साथी
मेरे लिए राजभोग सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि एक कहानी है मेरी मेहनत, मेरी जीत और उस पल की खुशी की कहानी और शायद यही वजह है कि हर बार इसका स्वाद मेरे दिल तक उतर जाता है.
राजभोग अपनी विशिष्ट पाक विधि के लिए जाना जाता है, जिसमें नरम छेना (पनीर) के गोले खोया, मेवे और मसालों के लजीज मिश्रण से भरे जाते हैं, जिससे एक शाही मिठाई तैयार होती है. इन सभी सामग्रियों के संयोजन से एक समृद्ध और स्वादिष्ट स्वाद उत्पन्न होता है, जो राजभोग को भारत और अन्य जगहों पर एक लोकप्रिय मिठाई बनाता है.
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पाक परंपरा
राजभोग का आविष्कार शाही दरबारों में काम करने वाले कुशल बंगाली हलवाईयों की देन है. इन कारीगरों ने मिठाई बनाने की कला में महारत हासिल की और राजभोग रसगुल्ले को बनाया. राजभोग रसगुल्ले से इस मायने में अलग है कि इसमें खोया, मेवे और मसाले अच्छे से भरे जाते हैं जो इसके स्वाद को बढ़ाने का काम करते हैं.
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