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गंदी नजर से देखता था देवर, पति बोले ‘अडजस्ट करो’… Joint Family में 15 साल तिल-तिल टूटती रही- मेरी कहानी

एक महिला की सच्ची कहानी, जिसने 15 साल तक जॉइंट फैमिली में चुप रहकर सब सहा. जानिए कैसे बदलती है शादी के बाद जिंदगी-

गंदी नजर से देखता था देवर, पति बोले ‘अडजस्ट करो’… Joint Family में 15 साल तिल-तिल टूटती रही- मेरी कहानी

“पति ने कहा था ‘जरा मैनेज कर लो'… और उसी दिन से मैंने 15 साल तक चुप रहना सीख लिया. सबके बीच रहती थी, लेकिन हर दिन डर के साथ जीती थी.

मैं हमेशा सोचती थी कि शादी के बाद लड़की का घर बदलता है… लेकिन मेरे लिए घर ही नहीं, दुन‍िया बदल गई. मैंने कभी नहीं सोचा था कि शादी के बाद सबसे बड़ी लड़ाई बाहर की दुनिया से नहीं, अपने ही घर के अंदर होगी. जॉइंट फैमिली थी. लोग, रिवाज़, हंसी, रिश्तों की भीड़… और उसी भीड़ में मेरा अकेलापन.

शुरुआत में सब ठीक लगा. मैंने कोशिश की कि सबको अपना बना लूं, चाय समय पर, खाना स्वाद के हिसाब से, रिश्तों में मीठे शब्द… ताकि कोई यह न कह दे कि “नई बहू एडजस्ट नहीं कर पाती.”

लेकिन कुछ समय बाद एक ऐसा सच सामने आया, जिसे मैं शब्दों में कह भी नहीं पाती थी- घर का माहौल मेरे लिए असहज होने लगा. किसी के बोलने का तरीका, किसी का बार‑बार घूरकर देखना, किसी की मौजूदगी से घबराहट… ये छोटी‑छोटी चीजें मिलकर मेरे अंदर एक डर पैदा करने लगीं.

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बड़ा परिवार था, लोगों का आना-जाना, हंसी-मज़ाक… मुझे लग रहा था कि मैं एक खुशहाल संयुक्त परिवार का हिस्सा हूं. लेकिन धीरे-धीरे कुछ ऐसा होने लगा, जिसका नाम तक लेने की हिम्मत नहीं थी.

एक दिन जब मेरे देवर ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, तो मुझे अजीब लगा… लेकिन मैंने उसे “गलती” समझकर नजरअंदाज कर दिया. फिर वो बार-बार होने लगा. कभी रास्ता रोकना, कभी बिना वजह पास आना… और हर बार मैं चुप रही.

मैंने खुद को समझाया- “शायद मैं ही ज़्यादा सोच रही हूं.”

मैंने चुप्पी को अपना हथियार बना लिया… क्योंकि जॉइंट फैमिली में सच बोलने का मतलब अक्सर “घर तोड़ना” समझ लिया जाता है. या शायद डर था… या ये कि कोई मानेगा ही नहीं.

मैंने हिम्मत करके एक दिन अपने पति को बताया. उस दिन मुझे लगा था कि अब सब ठीक हो जाएगा.
लेकिन उनका जवाब आज भी मेरे कानों में गूंजता है - 

“इतना बड़ा मुद्दा मत बनाओ… घर-परिवार है, थोड़ा मैनेज कर लो.”

“उस दिन मुझे समझ आया- घर में रहने और सुरक्षित महसूस करने में कितना बड़ा फर्क होता है.”

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उस पल कुछ टूट गया था मेरे अंदर.

मैं समझ गई कि यहाँ कोई मेरा नहीं है.

उस दिन पहली बार लगा- मैं सिर्फ एक बहू हूँ, एक इंसान नहीं.

जिस घर को मैंने अपना माना, वहां मेरी तकलीफ की कोई जगह नहीं थी.

उसके बाद हर दिन एक जैसी लड़ाई होती थी- बाहर से नहीं, अंदर से.
हर वक्त डर, हर वक्त असहजता… और सबसे ज्यादा खुद से सवाल - “क्या मैं ही गलत सोच रही हूं?”

धीरे-धीरे मैंने खुद को बदल लिया.  हंसना कम कर दिया, अकेले रहना बंद कर दिया, हर वक्त सतर्क रहने लगी.

लोग कहते थे- “तुम पहले जैसी नहीं रहीं.”
लेकिन किसी ने ये नहीं पूछा कि मैं क्यों बदल गई.

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15 साल… ऐसे ही बीत गए. हर दिन खुद को समझाते हुए, हर रात खुद को संभालते हुए.

आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं, तो सिर्फ एक बात समझ आती है- गलती मेरी चुप रहने की थी.

किसी भी रिश्ते या “परिवार” के नाम पर अपना सम्मान खोना जरूरी नहीं होता.

अगर उस दिन मैंने खुद के लिए खड़े होने की हिम्मत दिखाई होती, तो शायद मेरी जिंदगी अलग होती.

आज मेरी 12 साल की एक बेटी है. देवर की शादी हो गई है. उसकी दो बेटि‍यां हैं. वह आज भी हमारे घर आता जाता है. र‍िश्‍ते एकदम नॉर्मल हैं, जैसे किस भी पर‍िवार में होते हैं. वह आज भी मुझसे भद्दे मजाक करता है, जो मुझे पसंद नहीं, ले‍कि‍न पर‍िवार में सब उन पर हंसते हैं. और मैं आज भी चुप हूं...

हां, मेरी बेटी अक्‍सर मुझे कहती है क‍ि मां आपको कोई भी कुछ भी कहकर चला जाता है. आप किसी को जवाब क्‍यों नहीं देती. उसे कैसे समझाऊं कि उसकी मां बहुत कमजोर है, अंदर से जाने किस बात का ड़र है उसे कि बोलने से क्‍या हो जाएगा. सब उसे बुरा कहेंगे, वह एक खराब बहू और बेकार बेटी कहलाएगी. और भी जानें क्‍या-क्‍या.

पर अब मैं चाहती हूं कि जो दर्द मैं 15 साल तक सहती रही, वो किसी और को न झेलना पड़े… इसलिए आज ये कहानी कह रही हूं. शायद यह कहानी मैं अपनी बेटी को कभी सुना न पाऊं. हालांकि मेरी चुप्‍पी की आदत और डरपोक नेचर ने उसे र‍िबेल किस्‍म का बना द‍िया है. वह सबसे फाइट करती है और मजबूत लड़की है. मेरे जीवन का यही सबसे बड़ा सुख है कि वह कभी मेरी तरह घुटेगी नहीं...

अगर वक्त पीछे जा सके…

कभी कभी सोचती हूं आज अगर वही हालात हों, तो मैं क्या अलग करूंगी? तो मैं चुप नहीं रहना सीखती. मैं  खुद के लिए खड़ी होना नहीं टालती और हर डर को सच मानने की आदत छोड़ देती.

क्योंकि अब समझ आया है कि डर जितना नजरअंदाज किया जाए, उतना ही बड़ा होता जाता है. 

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आजकल योगा और एक किटी ज्‍वॉइन की है, इससे मन को शांत‍ि है और खुद में भी बदलाव महसूस कर रही हूं. अभी इतनी उम्र भी नहीं है मेरी, अभी तो लाइफ बची है. आपको ल‍िखे इस लेटर के बाद मन का बोझ हल्‍का हुआ है अब आगे बढ़ पाऊंगी. हां, बेटी से इस लेख का ल‍िंक जरूर साझा करूंगी.

हर‍ियाणा के रोहतक से मंजू (बदला हुआ नाम और शहर)

 इस कहानी से क्या सीख मिलती है?

  • चुप रहना हमेशा समाधान नहीं होता
  • असहजता को नजरअंदाज करना नुकसानदेह हो सकता है
  • हर रिश्ते में सम्मान जरूरी है

पाठक को एड‍िटर की सलाह : आपकी सुरक्षा सबसे पहले है. अगर किसी को खतरा/हिंसा का डर हो, तो भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें या स्थानीय आपात सेवाओं/महिला हेल्पलाइन से मदद ले सकती हैं.

अस्‍वीकरण : यह लेख हमारे एक पाठक का नीज‍ि अनुभव है. इसमें व्‍यक्‍त व‍िचार उनके अपने हैं.

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