दादा-दादी या नाना-नानी का प्यार पोते-पोतियों के लिए किसी से छिपा नहीं है. इसलिए अक्सर कहा जाता है, मूलधन से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कभी-कभी यही जरूरत से ज्यादा प्यार बच्चे के स्वभाव को बिगाड़ सकता है? जी हां, पेरेंटिंग एक्सपर्ट्स ने एक ऐसी ही बड़ी गलती के बारे में चेतावनी दी है, जो बच्चों को जिद्दी, चिड़चिड़ा बना सकती है.
हैप्पी माइंड्स की फाउंडर श्वेता गांधी बताती हैं कि अक्सर कई मां बच्चे से कहती है, स्क्रीन नहीं देखनी है, लेकिन तभी दादी उसे मोबाइल दे देती हैं. मां चॉकलेट खाने से मना करती है, तो दादी कहती हैं, अरे, एक चॉकलेट से क्या होगा, खाने दो. ऐसे में मां को लगता है कि बच्चों के लिए जो नियम और सीमाएं वह तय कर रही है, उन पर की गई उसकी सारी मेहनत बेकार हो रही है.
बच्चा सोचता है मां की बातों की कोई अहमियत नहीं-
ऐसे में बच्चा समझने लगता है कि मम्मी के बनाए नियमों की उतनी अहमियत नहीं है, क्योंकि अगर मम्मी किसी चीज के लिए मना करेंगी, तो घर में कोई दूसरा व्यक्ति उसे अनुमति दे ही देगा. धीरे-धीरे बच्चे के मन में यह धारणा बन सकती है कि मम्मी की बात मानना जरूरी नहीं है. अगर वह कोई चीज मना करेंगी, तो दादी तो दे ही देंगी.
5 साल के बाद यहीं चीजें करती हैं बैकफायर-
5 साल के बाद, जब बच्चे का दिमाग और उसकी समझ विकसित होने लगती है, तब यही बातें बैकफायर करने लगती हैं. फिर बच्चा स्क्रीन देखने की जिद करेगा और आपकी बात भी नहीं मानेगा. बाद में यही दादा-दादी कहेंगे, लो भाई, तुम्हारा बच्चा है, अब तुम ही संभालो. हमसे तो नहीं संभलता, पता नहीं कितना जिद्दी हो गया है. लेकिन कोई यह नहीं समझता कि बच्चा जिद्दी आखिर बना क्यों.
दादा-दादी और मम्मी-पापा सब एक टीम में रहें-
एक्सपर्ट का कहना है कि प्यार कितना भी हो, अगर उसमें सीमाएं नहीं होंगी, तो बच्चा जिद्दी, गुस्सैल और जल्दी चिड़चिड़ा होने वाला बन सकता है. इसलिए जरूरी है कि दादा-दादी और मम्मी-पापा अलग-अलग टीम की तरह नहीं, बल्कि एक टीम बनकर काम करें. अगर बच्चे के लिए किसी बात पर एक व्यक्ति ने ना कहा है, तो परिवार के बाकी सदस्यों को भी उसी फैसले का सम्मान करना चाहिए.
क्या कहती है रिसर्च-
क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च से पता चला है कि जब दादा-दादी और माता-पिता बच्चों की परवरिश के एक जैसे तरीकों का इस्तेमाल करते हुए मिलकर काम करते हैं, तो परिवारों में बच्चों के व्यवहार, परवरिश को लेकर आत्मविश्वास और माता-पिता व दादा-दादी के रिश्तों में सुधार देखने को मिलता है.
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