Periods Pain: पीरियड्स का दर्द क्या होता है, शायद इस बात को वही महिला समझ सकती है जो हर महीने इस दर्द से गुजरती है. हाल ही में पीरियड्स लीव्स को अनिवार्य करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई, जिसे ये कहते हुए खारिज कर दिया गया कि अगर ऐसा किया गया या कानून बनाया गया तो इससे महिलाओं को नौकरी मिलने में दिक्कत हो सकती है और यह उनके करियर के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है. लेकिन क्या इस बात से वो महिला संतुष्ट होगी जिसने हमेशा खुद को अपने सामर्थ्य से ज्यादा एक कदम आगे रखा है? जो हर महीने अपने दर्द से लड़ते हुए खुद को एक कदम आगे बढ़ाती है? इन सबके बीच मुझे अपनी एक पुरानी सहेली याद आ गई, जिसे आज मैं अपनी डायरी के जरिए आप सब से शेयर करना चाहती हूं.
मेरी एक सहेली थी जिसको पीरियड्स होने पर उसके घर में एक अलग कमरे में ठहरा दिया जाता था. ना वो किचन में जा सकती थी और ना ही कोई काम कर सकती थी. हालांकि मेरे घर में ऐसे कोई नियम नहीं थे. उसके घर के ये नियम देखकर मुझे बहुत चिढ़ होती थी कि ये क्या बात हुई. वो ना तो दूसरे कमरे में जा सकती थी, ना किचन में जा सकती थी और ना ही किचन में रखे हुए फ्रिज को छू सकती थी. हालांकि उसके यहां ये नियम बहुत समय से चला आ रहा था. इसलिए इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता था. तब तो इन सब पर गुस्सा आता था लेकिन आज समझ में आया कि ऐसा करने के पीछे की असल वजह क्या थी. और वो थी उस महिला या लड़की को आराम देना जिसका महीना चल रहा हो.
शायद उस समय लोगों को समझाने का तरीका यही था, धर्म से जोड़कर.भारत ऐसा देश में जहां पर अगर आप किसी को धर्म से जोड़ते हुए कुछ बताएंगे और करने को बोलेंग तो लोग उस बात का आराम से मान लेते हैं. शायद यही वजह थी कि महिलाओं को आराम देने के लिए इसे धर्म से जोड़ते हुए लोगों को बताया गया और ये परंपरा लंबे समय से चलती आ रही है. हालांकि आज के समय में बहुत कुछ बदल गया है. लेकिन दिमाग में मेरे भी कहीं ना कहीं वो चीज रहती है कि पीरियड्स है तो मंदिर ना जाऊं और भगवान को ना छुएं....
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मुझे अपने वो दिन भी याद आते हैं जब मैं घर पर होती थी. पीरियड्स होते थे तो ना तो मैं बेड से उठती थी और ना ही कोई काम करती थी. मां सब कुछ बेड पर लाकर देती थी. गरम पानी का बैग लिए बस मैं अपनी जगह पर लेटे हुए टीवी देखती थी और मोबाइल चलाती थी. लेकिन आज जब उस पुराने समय के बारे में सोचती हूं तो मन थोड़ा उदास हो जाता है. उस समय ये सब बहुत नॉर्मल लगता था, लेकिन आज, जब मैं अकेले रहती हूं, तो वो दिन किसी लग्जरी से कम नहीं लगते हैं.
अब पीरियड्स का मतलब है, दर्द के साथ भी उठना, खुद को संभालना और ऑफिस जाना. पेट में तेज दर्द जो पैरों से लेकर कमर तक फैला रहता था. चलने की हिम्मत नहीं हो रही थी, खड़े होना भी मुश्किल लगता था. लेकिन काम को नहीं छोड़ सकते हैं. थोड़ी देर आराम कर के खुद को मेंटली स्ट्रांग बनाकर और खुद से ही बात कर के खुद से कहती हूं- 'चल, तू कर सकती है.' ऑफिस के लिए तैयार हो जाती हूं. ऑफिस में 9 घंटे की शिफ्ट के दौरान कमर का दर्द और बढ़ जाता है. पेट में दर्द और ब्लोटिंग इतनी कि कुछ खाने का भी मन नहीं करता. चेहरे पर एक अजीब-सी उदासी रहती है जिसे शायद हर कोई महसूस कर ही लेता है.
मेरी मैम तो हमेशा पूछती हैं कि क्या हुआ, 'आज बहुत सुस्त लग रही हो, सब ठीक है?” ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा हंसती और बात करती रहती हूं. बस मैं भी उनको मुस्कुरा कर कह देती हूं हाँ, सब ठीक है.'
किसी तरह 9 घंटे का काम पूरा करके घर वापसी होती है और फिर ये स्ट्रांग वुमेन बेड देखते ही ढेर हो जाती है. मैं अकेले रहती हूं, इसलिए इस बात का टेंशन नहीं होता है कि खाना बनाना ही है. लेकिन इस समय में ये ख्याल जरूर आता है है कि इंडिपेंडेंट होना कभी-कभी बहुत मुश्किल भी हो जाता है. लेकिन एक राहत भी मिलती है कि अच्छा है मै अकेले हूं अगर मेरी भी शादी होती और फैमिली के साथ होती, तो क्या मुझे आराम मिल पाता? या फिर दर्द के बावजूद सब कुछ करना पड़ता?
लेकिन अब जिंदगी अलग है. यहाँ जिंदगी रुकती नहीं है. दर्द हो या थकान, काम तो करना ही होता है. दर्द तो वही रहता है, लेकिन हम उसके साथ चलना सीख जाते हैं. थोड़ी देर आराम करने के बाद याद आया कि खाना भी बनाना है और सुबह की तैयारी भी करनी है. पीरियड्स का दर्द वही समझ सकता है जो इससे गुजरा हो. ऑफिस में जब भी कोई लड़की पीरियड्स के कारण छुट्टी मांगती है, तो कई लोगों का मुंह बन जाता है. मुझे अपने पुराने ऑफिस का एक सीनियर याद आता है. उन्हें लगता था कि लड़कियां बहुत बहाने बनाती है. कभी घर के काम से छुट्टी, कभी पीरियड्स के दर्द से. लेकिन शायद उन्हें यह समझ नहीं आता था कि यह दर्द हमने खुद नहीं चुना है. ये एक नैचुरल प्रोसेस है जो हर महिला की जिंदगी का हिस्सा है.
आजकल कुछ जगहों पर ऐसी मशीनें भी हैं जो पुरुषों को पीरियड्स जैसा दर्द महसूस करवाती हैं. दिलचस्प बात यह है कि कई पुरुष उस दर्द को कुछ सेकंड भी सहन नहीं कर पाते. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करने के बाद मेरे मन में सवाल आता है कि अगर यही दर्द किसी पुरुष को हो, तो क्या वो उस दिन ऑफिस जा पाएगा? क्या वह घर आकर खाना बना पाएगा या अगले दिन की तैयारी कर पाएगा?
एक महिला हर दिन, हर हाल में घर और काम दोनों संभालती है.अपने दर्द के साथ भी, अपनी जिम्मेदारियों के साथ भी, फिर भी जब बराबरी की बात होती है, तो कहीं ना कहीं लगता है, शायद अभी भी उस बराबरी को समझना बाकी है और उस बराबरी की असली समझ अभी भी अधूरी है.
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