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दफ्तर में हुआ अपमान तो छेड़ दिया 'राष्ट्रीय आंदोलन', Period Leave की मुहिम छेड़ने वाली रंजीता प्रियदर्शिनी ने बताई अपनी कहानी

Paid Period Leave India : पेड पीरियड लीव की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर. रंजीता प्रियदर्शिनी के संघर्ष से ओडिशा और कर्नाटक में मिला हक. जानें क्या है पूरा मामला.

दफ्तर में हुआ अपमान तो छेड़ दिया 'राष्ट्रीय आंदोलन', Period Leave की मुहिम छेड़ने वाली रंजीता प्रियदर्शिनी ने बताई अपनी कहानी

Ranjita Priyadarshini PPL Campaign : भारत में 'पेड पीरियड लीव' (Paid Period Leave) को लेकर छिड़ी बहस अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कानून बनाने की गेंद केंद्र और राज्य सरकारों के पाले में डाल दी है, वहीं दूसरी ओर सड़कों और नीतिगत गलियारों में इस आंदोलन ने जोर पकड़ लिया है. इस पूरे अभियान का चेहरा बनकर उभरी हैं रंजीता प्रियदर्शिनी, जो पिछले तीन वर्षों से बिना थके महिलाओं के इस अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं. आइए जानते हैं कौन हैं रंजीता प्रियदर्शिनी...

व्यक्तिगत अपमान से 'राष्ट्रीय आंदोलन' तक का सफर

इस मुहिम की शुरुआत रंजीता के एक कड़वे अनुभव से हुई थी. साल 2022 में, जब रंजीता ने पीरियड में होने वाले दर्द के दौरान ऑफिस से छुट्टी मांगी, तो उन्हें सपोर्ट के बजाय अपमान और इस्तीफे के दबाव का सामना करना पड़ा. उन्होंने हार मानने के बजाय नौकरी छोड़ दी और ‘पेड पीरियड लीव (PPL) कैंपेन' की शुरूआत की. जो लड़ाई एक दफ्तर से शुरू हुई थी, आज वह 23 राज्यों और 6 देशों तक फैल चुकी है.

वैश्विक मंच पर गूंजी भारत की आवाज

रंजीता की यह कोशिश केवल ज्ञापन देने तक सीमित नहीं रही. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) के सम्मेलनों में नैरोबी से लेकर न्यूयॉर्क तक- पेड पीरियड लीव को 'ह्यूमन राइट्स' और 'वर्कप्लेस डिग्निटी' के रूप में पेश किया. थाईलैंड, मलेशिया और ब्रिटेन जैसे देशों में भी उन्होंने इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय संवाद स्थापित किया, जिससे यह भारत के साथ-साथ एक ग्लोबल इश्यू बन गया.

बदलाव की आहट: राज्यों ने बढ़ाया कदम

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इसे नीतिगत विषय बताकर हस्तक्षेप से मना कर दिया हो, लेकिन रंजीता के निरंतर संवाद का असर सरकारी नीतियों में दिखने लगा है. ओडिशा ने 2024 में कामकाजी महिलाओं के लिए इस अवकाश को लागू किया. 2025 में कर्नाटक 12 दिन की एनुअल पेड पीरियड लीव का ऐतिहासिक प्रावधान शुरू किया. प्राइवेट सेक्‍टर की बात करें तो वर्तमान में देश के 64 बड़े संस्थान और 27 अंतरराष्ट्रीय संगठन इस नीति को अपना चुके हैं.

रंजीता कहती हैं, उन्‍हें अदालत के रुख से फर्क नहीं पड़ता, बल्कि वो तो पहले से ही ये मानकर चल रही हैं कि मामला, सरकारों के हाथ में है. अब रंजीता का पूरा ध्यान सीधे सरकारों के साथ मिलकर श्रम कानूनों (Labour Laws) में संशोधन करवाने पर है. उनका मानना है कि जब तक कार्यस्थल पर महिलाओं को शारीरिक कष्ट के दौरान सम्मानजनक अवकाश और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक कार्यस्थल की समानता अधूरी है.

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