सुप्रीम कोर्ट में पूरे देश में छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए पीरियड्स लीव की मांग वाली याचिका दायर की गई थी. इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है. सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा इस तरह की याचिकाएं कभी-कभी महिलाओं को कमजोर दिखाने का माहौल बना देती हैं. ऐसी याचिकाएं यह डर पैदा करती हैं कि मासिक धर्म महिलाओं के साथ कुछ बुरा होने जैसा है. इससे उन्हें ही नुकसान होगा. ये याचिका शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी. लेकिय क्या आप जानते हैं कि भारत में ऐसे कई राज्य हैं जहां पर महिलाओं को मासिक धर्म अवकाश दिया जाता है. भारत में पीरियड लीव का कोई कानून नहीं है, लेकिन कई राज्यों ने महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की पॉलिसी शुरू की हैं.
कर्नाटक में महिलाओं को पीरियड लीव दी जाती है. हर महीने 1 दिन यानी साल में कुल 12 दिन की पीरियड लीव महिलाएं ले सकती है. सरकारी और प्राइवेट दोनों सेक्टर पर ये पॉलिसी लागू है. पॉलिसी के अनुसार 18 से 52 साल की सभी महिलाओं पीरियड लीव ले सकती है. सबसे बड़ी बात पीरियड लीव लेने के लिए महिलाओं को किसी मेडिकल सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं है.
बिहार बना ये पॉलिसी शुरू करने वाला पहला राज्य
बिहार राज्य में भी महिलाओं को पीरियड्स लीव दी जाती है. बिहार भारत का पहला राज्य था जिसने 1992 में यह पॉलिसी शुरू की थी. हालांकि इसका फायदा सिर्फ सरकारी महिला कर्मचारियों तक ही सीमित है. पीरियड्स लीव देने वाले राज्यों की सूची में ओडिशा राज्य भी आता है. ओडिशा ने अगस्त 2024 में ये पॉलिसी लागू की थी. महिलाएं हर महीने 1 दिन यानी सालाना 12 दिन की पीरियड लीव ले सकती हैं. सरकारी और प्राइवेट दोनों सेक्टर में 55 साल तक की महिला कर्मचारी इस पॉलिसी का फायदा उठा सकती है.
इसके अलावा केरल यूनिवर्सिटी में फीमेल स्टूडेंट्स को पीरियड्स लीव दी जाती हैं. यानी ऐसे कई राज्य हैं जहां पर महिलाओं के लिए पीरियड्स लीव पॉलिसी बनाई गई है. वहीं ऐसी कई प्राइवेट कंपनियां भी हैं जो कि अपनी महिला कर्मचारियों को पीरियड्स लीव देती हैं.
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