क्या आपका बच्चा भी आपसे कभी ऐसा कहता है? या आपने अपने आसपास ऐसा कोई परिवार देखा है, जहां बच्चे अपने माता-पिता को लेकर जरूरत से ज्यादा सजग हो जाते हैं? उन्हें लगता है कि उनके दोस्त क्या सोचेंगे, लोग क्या कहेंगे, मम्मी-पापा कितने मॉडर्न दिखते हैं या नहीं. धीरे-धीरे यही सोच माता-पिता और बच्चों के रिश्ते में दूरी भी पैदा कर सकती है.
इस बदलती सोच पर गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. नाज फातिमा का कहना है कि बच्चों के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि माता-पिता कोई “इमेज” नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की सबसे मजबूत नींव हैं. उन्हें बदलने की कोशिश करने के बजाय, उनका सम्मान और अपनापन बनाए रखना चाहिए.
ऐसा क्यों सोचते हैं बच्चे?
सोशल मीडिया के इस “कूल” कल्चर में बच्चे खुद को मॉडर्न और अपडेटेड दिखाना चाहते हैं. यही वजह है कि वे कभी-कभी अपने घर, अपनी भाषा और अपने माता-पिता को भी उसी नजर से देखने लगते हैं. अगर मम्मी साड़ी पहनती हैं, शुद्ध हिंदी बोलती हैं, या पापा थोड़ा पुराने ढंग से बात करते हैं, तो कुछ बच्चों को लगता है कि इससे उनके दोस्तों के बीच उनकी छवि खराब हो सकती है. यहीं से वे अपने माता-पिता को टोकना शुरू कर देते हैं.
डॉक्टर फातिमा का क्या कहना है?
डॉक्टर फातिमा ने अपने सोशल मीडिया पर एक वीडियो में कहा है कि बच्चों को यह समझना चाहिए कि माता-पिता कोई “प्रोजेक्ट” नहीं होते, जिन्हें अपनी पसंद के हिसाब से बदला जाए. बार-बार यह कहना “ऐसे बैठिए”, “वैसे मत बोलिए”, “दोस्तों के सामने ऐसा मत कीजिए” धीरे-धीरे माता-पिता को यह महसूस करा सकता है कि वे अपने ही बच्चे की दुनिया में फिट नहीं बैठते. इसलिए बच्चों को उन्हें बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.
दोस्तों के बारे में इतना क्यों सोचते हैं बच्चे?
अक्सर बच्चों को डर रहता है कि अगर उनके माता-पिता दूसरों से अलग दिखें, अलग बोलें या अलग व्यवहार करें, तो उनका मजाक उड़ाया जा सकता है. ऐसे में डॉक्टर का कहना है कि बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि अच्छे दोस्त वही होते हैं, जो आपके परिवार और आपकी जड़ों का सम्मान करें. यदि कोई सिर्फ इसलिए मजाक उड़ाता है कि आपकी मां हिंदी बोलती हैं या आपके पापा सीधे-सादे हैं, तो समस्या आपके माता-पिता में नहीं, बल्कि उस सोच में है.
माता-पिता जैसे हैं, उन्हें वैसे ही प्यार करें
हर मां-बाप परफेक्ट नहीं होते. ऐसे में डॉक्टर फातिमा कहती हैं कि बच्चों को अपने माता-पिता को उसी रूप में अपनाना चाहिए, जैसे वे हैं. उनका पहनावा, उनकी भाषा और उनका व्यवहार, यही उनकी पहचान है. उन्हें बदलने की कोशिश करने के बजाय, उनके साथ खड़ा होना ज्यादा जरूरी है.
माता-पिता को न सिखाएं
बच्चों को यह समझना चाहिए कि हर समय माता-पिता को टोकना या सुधारना सही नहीं है. अगर कोई बात बहुत जरूरी हो, तो उसे प्यार और सम्मान के साथ कहा जा सकता है, लेकिन हर छोटी बात पर रोक-टोक करना, उन्हें जज करना या दोस्तों के सामने शर्मिंदा महसूस कराना गलत है.
यहां देखिए वीडियो...
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