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90 दिन जंक फूड नहीं खाया, शरीर ने खुद कम कर दी क्रेविंग्स और बदल गई पूरी लाइफस्टाइल

Benefits of Not Eating Outside Food: 25 साल की पूजा ने बताया कि 90 दिनों तक बाहर का खाना न खाने से उसकी जिंदगी में क्या बदलाव आया. इस आर्टिकल में जानें कैसे उन्होंने इस चैलेंज को पूरा किया.

90 दिन जंक फूड नहीं खाया, शरीर ने खुद कम कर दी क्रेविंग्स और बदल गई पूरी लाइफस्टाइल
90 Days Challenge: जंक फूड से 3 महीने दूरी, शरीर ने खुद बदल लिया अपना पैटर्न. (AI Generated Image)

मैं पूजा हूं, उम्र 25 साल. मेरा ख्याल था कि खान-पान पर कंट्रोल और जंक फूड से दूरी, ये सब सिर्फ बुजुर्ग लोगों के लिए जरूरी है. मेरे जैसे यंग और फिट लोगों को जंक फूड से क्या फर्क पड़ता है. पढ़ाई और जॉब के सिलसिले में जब मैं अपना कस्बा छोड़कर शहर पहुंची, तो पिज्जा, बर्गर, फ्राइज और बाहर का खाना मेरे डेली रूटीन का हिस्सा बन चुका था. फूड ऐप्स ने इस आदत को और बढ़ा दिया. ऑफिस के बाद रोज कुछ ऑर्डर करना या वीकेंड पर बाहर खाना मेरे लिए नॉर्मल था. लेकिन धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि शरीर पर इसका असर दिखने लगा है. बार-बार इनडाइजेशन, एसिडिटी, थकान, स्किन पर डलनेस और मेरा वेट भी बढ़ने लगा. अब मुझे एहसास हुआ कि अगर मैंने इसे गंभीरता से न लिया तो बाद में पछताना पड़ेगा.

एक दिन मैंने तय किया कि 90 दिन तक पूरी तरह जंक फूड बंद करके देखूंगी. ये कोई डाइट प्लान नहीं था, बस एक एक्सपेरिमेंट था यह समझने के लिए कि मेरा शरीर कैसे रिएक्ट करता है. शुरुआत आसान नहीं थी. पहले ही हफ्ते में क्रेविंग इतनी ज्यादा हुई कि कई बार लगा कि ये चैलेंज बीच में ही छोड़ दूं. शाम होते ही कुछ तला-भुना खाने का मन करता था और मोबाइल पर फूड ऐप खोलने की आदत खुद-ब-खुद चलने लगती थी.

घर के टेस्टी फूड ने ली जंक फूड की जगह-
शरीर जैसे पुराने पैटर्न को मिस कर रहा था. चिड़चिड़ाहट, बार-बार भूख लगने का एहसास और हर समय कुछ टेस्टी खाने का मन. लेकिन मैंने खुद को कंट्रोल किया और सोचा कि क्यों न घर में ही कुछ टेस्टी और मजेदार डिश बनाई जाए. मैंने नए-नए प्रयोग करके घर पर भी कई हेल्दी रेसिपीज ट्राई कीं. इस तरकीब ने मेरी काफी मदद की. मेरी क्रेविंग्स भी कम हुईं और मेरी बॉडी को न्यूट्रिशन भी मिलने लगा.

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Photo Credit: Pexels

डाइजेशन और एनर्जी लेवल सुधरा-
तीसरे हफ्ते तक पहुंचते-पहुंचते मेरा डाइजेशन भी बेहतर हो गया. पहले जो भारीपन और ब्लोटिंग महसूस होती थी, वो लगभग खत्म हो गई. करीब एक महीने बाद सबसे बड़ा बदलाव क्रेविंग्स में दिखा. जो चीजें पहले बहुत आकर्षित करती थीं, अब उनकी चाहत धीरे-धीरे कम होने लगी. मुझे खुद हैरानी हुई कि अब बिना जंक फूड के भी मैं बिल्कुल ठीक महसूस कर रही हूं. यहां तक कि कई बार बाहर का खाना देखकर भी मन नहीं करता था.

60 दिन के बाद ये बदलाव और ज्यादा साफ हो गया. शरीर जैसे खुद ही तय करने लगा कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं. एनर्जी लेवल पहले से बेहतर था, दिनभर थकान नहीं लगती थी और मूड भी ज्यादा स्टेबल रहने लगा.

शरीर ने खुद ही नया पैटर्न अपना लिया-

90 दिन पूरे होने तक मैंने समझ लिया कि क्रेविंग्स सिर्फ आदत होती हैं, जरूरत नहीं. अगर आप कुछ समय तक खुद को कंट्रोल कर लें, तो शरीर खुद ही नया पैटर्न अपना लेता है. ऐसा नहीं है कि मैं अब जंक फूड कभी भी नहीं खाती, लेकिन अब उसे लेकर पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा. अब मैं ज्यादा बैलेंस के साथ खाती हूं. ये 90 दिन मेरे लिए सिर्फ एक चैलेंज नहीं थे, बल्कि एक ऐसा एक्सपीरियंस था जिसने खाने को लेकर मेरी सोच बदल दी.

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