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Success Story: पापा की बिना डिग्री वाली 'डॉक्टरी' पर हंसती थी दुनिया, अब बेटा बनेगा 'असली' डॉक्टर

बिहार के नवादा के प्रशांत राज की सक्‍सेस स्‍टोरी कमाल की है. इनके पिता गांव में प्राथमिक उपचार करते थे, पर डिग्री न होने से लोग ताने देते थे. इसी कसक को ताकत बनाकर प्रशांत ने पहले ही प्रयास में NEET UG 2026 में 3017वीं रैंक पाकर इतिहास रच दिया. पढ़िए एक बेटे के संकल्प की पूरी कहानी.

Success Story: पापा की बिना डिग्री वाली 'डॉक्टरी' पर हंसती थी दुनिया, अब बेटा बनेगा 'असली' डॉक्टर
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एक पिता, जो दिन-रात गांव के लोगों का दर्द बांटता रहा, लेकिन एमबीबीएस का ठप्पा न होने के कारण समाज के तानों और उपेक्षा का शिकार होता रहा... उसी पिता के दर्द और छिने हुए सम्मान को अपना संकल्प बनाकर एक बेटे ने इतिहास रच दिया!" बिहार के नवादा जिले के छोटे से गांव ओरेना के रहने वाले प्रशांत राज की कहानी सिर्फ नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) पास करने की नहीं है. यह कहानी है उस बेटे की, जिसने बचपन में अपने पिता की आंखों में 'डिग्री न होने का दर्द' देखा था और उसी दिन अपनी आँखों में डॉक्टर बनने का सपना सजा लिया था.

पिता गाँव में प्राथमिक उपचार करते थे, लेकिन लोग उन्हें 'असली डॉक्टर' नहीं मानते थे. बेटे के सीने में यह बात तीर की तरह चुभी. प्रशांत ने इस कसक को अपनी ताकत बनाया और कोटा की बंद कमरों में अपनी रातों की नींद कुर्बान कर दी. नतीजा? पहले ही प्रयास में NEET UG 2026 में ऑल इंडिया रैंक 3017 हासिल कर प्रशांत ने न सिर्फ अपने पिता का सिर गर्व से ऊंचा किया, बल्कि उन सभी तानों का जवाब अपनी कामयाबी से दिया. ईडब्ल्यूएस श्रेणी में उन्हें 268वीं रैंक और कुल 634 अंक मिले हैं.   

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Photo Credit: NDTV

ग्रामीण मेडिकल प्रैक्टिशनर पिता से मिली प्रेरणा

प्रशांत के पिता समीर कुमार गांव के समीप नहर वाले इलाके में ग्रामीण मेडिकल प्रैक्टिशनर हैं और एक छोटी सी दवा की दुकान भी चलाते हैं. वर्षों से वे ग्रामीणों का प्राथमिक उपचार करते आ रहे हैं. प्रशांत बताते हैं कि बचपन से उन्होंने पिता को मरीजों की निस्वार्थ सेवा करते देखा, लेकिन कई बार सिर्फ एमबीबीएस की डिग्री न होने की वजह से लोगों को उन्हें कमतर आंकते भी देखा. उसी दिन प्रशांत ने ठान लिया था कि वे एमबीबीएस डॉक्टर बनेंगे और अपने पिता के सेवा भाव को एक नई पहचान दिलाएंगे.

प्रशांत भावुक होकर कहते हैं, "मैंने बचपन से देखा कि पापा लोगों की मदद करते थे, लेकिन कई लोग उन्हें उस सम्मान की नजर से नहीं देखते थे जिसके वे हकदार थे. तभी मैंने संकल्प लिया कि मैं एमबीबीएस डॉक्टर बनूँगा और अपने पिता के त्याग को उनका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाऊँगा."

सीमित संसाधन, लेकिन सपने बड़े

प्रशांत की मां मंजू देवी गृहिणी हैं. परिवार में एक भाई और दो बहनें हैं. बड़ी बहन बुलबुल राज ने डीएलएड की परीक्षा दी है, जबकि छोटी बहन सातवीं कक्षा में पढ़ रही है. एक साधारण ग्रामीण परिवार ने अपनी क्षमता से बढ़कर प्रशांत की पढ़ाई में हर संभव सहयोग दिया.

स्कूल से कोटा तक का कठिन सफर

प्रशांत ने अपनी शुरुआती पढ़ाई में भी प्रतिभा दिखाई. उन्होंने दसवीं की परीक्षा मॉडर्न इंग्लिश स्कूल से 93.8 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की. इसके बाद जीवन ज्योति पब्लिक स्कूल से 87 प्रतिशत अंकों के साथ इंटरमीडिएट पास किया. मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए उन्होंने एलन  कोटा का रुख किया. अनुशासित दिनचर्या, घर से दूरी का दर्द और लगातार मेहनत के दम पर उन्होंने पहले ही प्रयास में यह शानदार सफलता हासिल की.

रोज साढ़े आठ घंटे पढ़ाई, NCERT बनी सबसे बड़ा हथियार

प्रशांत बताते हैं कि वे प्रतिदिन करीब साढ़े आठ घंटे पढ़ाई करते थे. उनका मानना है कि जिस विषय में कमजोरी हो, उस पर सबसे ज्यादा समय देना चाहिए. उन्होंने एनसीईआरटी की किताबों को अपनी तैयारी की सबसे मजबूत नींव बताया. इसके अलावा भौतिकी और रसायन विज्ञान का नियमित रिवीजन, अधिक से अधिक प्रश्नों का अभ्यास और लगातार मॉक टेस्ट देने से उन्हें परीक्षा में काफी फायदा मिला.

अब सिर्फ एक सपना-जरूरतमंदों का मसीहा बनना

प्रशांत अपनी इस सफलता का श्रेय अपनी मां मंजू देवी, पिता समीर कुमार और अपने गुरुजनों को देते हैं. उनकी इस उपलब्धि से दादा संजीव कुमार, नाना बालेश्वर सिंह और पूरे गाँव में जश्न का माहौल है. अब उनका अगला लक्ष्य एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर एक कुशल और संवेदनशील डॉक्टर बनना है. उनका कहना है कि वे ऐसे गरीब और असहाय मरीजों की सेवा करना चाहते हैं, जिन्हें बेहतर इलाज आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता.  

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