IPS Birdev Done Success Story: जरा उस लम्हे की कल्पना कीजिए... हाथ में चरवाहे की लाठी, पैरों में खेतों की धूल और आंखों में सिर्फ एक ख़्वाब. जब परिणाम आया, तो वह किसी चमचमाते कोचिंग हॉल में नहीं, बल्कि खेतों के बीच भेड़ों को चरा रहे थे. लेकिन संघर्ष की वही धूल जब मेहनत के पसीने से मिली, तो इतिहास रचा गया.
महाराष्ट्र के एक बेहद साधारण चरवाहा परिवार से निकलकर संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले बिरदेव डोणे की सक्सेस स्टोरी सिर्फ एक IPS अधिकारी बनने की नहीं है. यह कहानी है एक भाई के त्याग की, कभी न हार मानने के जज़्बे की, और सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी अपनी जड़ों को सीने से लगाए रखने की.

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Photo Credit: Birdev Balabai Siddhappa Done
सपनों को पंखों की नहीं, विश्वास की ज़रूरत होती है-बिरदेव डोणे, भा.पु.से.
सबसे पहले बिरदेव डोणे की वह इंस्टाग्राम पोस्ट देखिए, जिसमें पांच तस्वीरें हैं. एक तस्वीर में वे परिवार के साथ हवाई जहाज़ से उतरते दिख रहे हैं और बाकी चार में परिजनों को तेलंगाना के हैदराबाद स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी का भ्रमण करवाते नज़र आ रहे हैं. ये तस्वीरें उनके संघर्ष और सफलता की पूरी दास्तान बयान करती हैं.

बिरदेव डोणे ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय स्तर पर 551वीं रैंक हासिल की थी
Photo Credit: Birdev Balabai Siddhappa Done
रही-सही कसर तस्वीरों का वह खूबसूरत कैप्शन पूरा कर देता है, जिसमें उन्होंने लिखा- "एक समय था जब मैं सिर्फ़ हवाई जहाज़ ✈️ देखने का सपना देखता था, और आज का दिन है जब मैं अपने परिवार को उन सीढ़ियों से ऊपर ले जा सका. यह पल शब्दों से परे है. कोई लग्ज़री नहीं, कोई स्टेटस नहीं... बस आभार 🙏. उनकी मुस्कान ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है.😊 उनकी खुशी ही असली सफलता है. सपनों को पंखों की ज़रूरत नहीं होती, उन्हें विश्वास, धैर्य और मकसद की ज़रूरत होती है और जब आप आगे बढ़ें, तो अपनी जड़ों को भी साथ ले जाएं."
सोलापुर के छोटे से गांव कांगल से शुरुआत
बिरदेव डोणे की कहानी महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के एक छोटे से गांव कांगल से शुरू होती है. वे एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं. बचपन में उन्होंने अपने पिता सिद्दप्पा डोणे के साथ खेतों में काम किया और भेड़ें चराईं. आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी उनके जीवन का हिस्सा बनी रही, लेकिन उन्होंने कभी परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके.

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Photo Credit: Birdev Balabai Siddhappa Done
जब रिज़ल्ट आया, तब भी हाथ में थी चरवाहे की लाठी
भेड़ चराने वाले बिरदेव डोणे के संघर्ष की एक बानगी उस दिन भी देखने को मिली, जब संघ लोक सेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा का अंतिम परिणाम घोषित किया. जब रिज़ल्ट आया, तो बिरदेव किसी कोचिंग क्लास या एयर-कंडीशंड कमरे में नहीं थे; वे बेलगावी में अपने परिवार के साथ भेड़ें चरा रहे थे. खबर सुनते ही, उन्हें चरवाहों के टेंट में पारंपरिक धनगर पगड़ी (फेटा) पहनाकर सम्मानित किया गया, जो उनकी शानदार और ऐतिहासिक यात्रा का एक खास प्रतीक था.
'खुद से पहले सेवा' का संकल्प और IPS का मुकाम
बिरदेव डोणे ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय स्तर पर 551वीं रैंक हासिल की थी. रैंक के आधार पर उन्हें भारतीय पुलिस सेवा कैडर मिला और वर्तमान में वे SVPNPA में अपनी ट्रेनिंग पूरी कर रहे हैं. IPS कैडर अलॉट होने पर भी बिरदेव ने सोशल मीडिया पर एक दिल छू लेने वाली पोस्ट साझा की थी.
उन्होंने लिखा- "सपनों से कर्तव्य तक... अब आधिकारिक तौर पर एक IPS अधिकारी. यह सफ़र किस्मत से तय नहीं हुआ; यह फोकस, निरंतरता, उम्मीद और अपने लक्ष्य पर अटूट विश्वास की नींव पर बना है. जहां से मैंने शुरुआत की थी और आज मैं जहां हूं, हर चुनौती ने मुझे गढ़ा है और हर असफलता ने मुझे कुछ सिखाया है. यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि मुझे इंडियन पुलिस सर्विस में जगह मिली है. अब तक के सफ़र के लिए आभारी हूं और आगे की ज़िम्मेदारियों के लिए पूरी तरह तैयार हूं. यह तो बस शुरुआत है... यह बैज सिर्फ़ एक सम्मान नहीं, एक वादा है-खुद से पहले सेवा. हमेशा मेरे साथ रहने के लिए धन्यवाद: आई, पापा, डड्या, दीदी, अक्ष्या और वहिनी."
भाई का साथ और दो विफलताओं के बाद मिली बड़ी सफलता
10वीं क्लास में 96% अंक लाने से लेकर प्रसिद्ध COEP (कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पुणे) से ग्रेजुएशन करने तक, बिरदेव ने हमेशा IPS अधिकारी बनने का सपना देखा था. लेकिन यह रास्ता आसान नहीं था. उचित मार्गदर्शन, आर्थिक सहयोग और बड़े शहर में कोचिंग सुविधाओं की कमी के कारण वे पूरी तरह अपने पक्के इरादे और अपने भाई के सहयोग पर निर्भर थे. उनके भाई, वासुदेव डोणे, भारतीय सेना में हैं और उन्हीं से प्रेरित होकर बिरदेव ने UPSC की तैयारी शुरू की थी. दिल्ली में दो साल तैयारी करने और फिर पुणे शिफ्ट होने के बाद बिरदेव को शुरुआती दो प्रयासों में असफलता का सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और महज 27 साल की उम्र में अपने तीसरे प्रयास में UPSC की कठिन परीक्षा पास कर इतिहास रच दिया.
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