'प्रधानमंत्री से SC के जज तक सब महिलाओं के आगे सिर झुकाते हैं...', सुप्रीम कोर्ट में बोली केंद्र सरकार

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक अहम सुनवाई के दौरान कहा कि हाल के कुछ फैसलों में 'पितृसत्ता' (patriarchy) और 'जेंडर स्टिरियोटाइप' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन ये अवधारणाएं भारतीय सभ्यता के मूल स्वभाव का हिस्सा नहीं रही हैं. सरकार का तर्क है कि ऐसे विचार बाहर से आए हैं और भारत की सांस्कृतिक परंपरा से मेल नहीं खाते.

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  • केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि भारत में महिलाओं को बराबरी और कई बार ऊंचा स्थान भी दिया गया है.
  • सरकार का तर्क है कि पितृसत्ता और जेंडर स्टिरियोटाइप जैसी अवधारणाएं भारतीय सभ्यता का हिस्सा नहीं हैं.
  • भारत में महिलाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है, जो समाज में उनके सम्मान को दर्शाता है.
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट में एक अहम सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने भारत में महिलाओं की स्थिति को लेकर बड़ा बयान दिया. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील देते हुए कहा कि भारत ने हमेशा महिलाओं को न सिर्फ बराबरी दी है, बल्कि कई बार उन्हें ऊंचे स्थान पर रखा है.

‘पितृसत्ता हमारी परंपरा का हिस्सा नहीं'

केंद्र ने अदालत में कहा कि हाल के कुछ फैसलों में 'पितृसत्ता' (patriarchy) और 'जेंडर स्टिरियोटाइप' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन ये अवधारणाएं भारतीय सभ्यता के मूल स्वभाव का हिस्सा नहीं रही हैं. सरकार का तर्क है कि ऐसे विचार बाहर से आए हैं और भारत की सांस्कृतिक परंपरा से मेल नहीं खाते.

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‘महिलाओं की पूजा करने वाली समाज'

सरकार ने अपनी बात को मजबूत करते हुए कहा कि भारत संभवतः दुनिया का इकलौता ऐसा समाज है जहां महिलाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है. राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के जज तक, सभी महिला देवताओं के सामने नतमस्तक होते हैं, जो महिलाओं के प्रति सम्मान को दर्शाता है.

संविधान सभा में महिलाओं की भूमिका का जिक्र

केंद्र ने यह भी याद दिलाया कि देश के संविधान निर्माण में महिलाओं की अहम भागीदारी रही है. राजकुमारी अमृत कौर और हंस मेहता जैसी प्रमुख महिला सदस्य संविधान सभा का हिस्सा थीं.

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‘विदेशी अवधारणाओं से बचें'

अपने तर्क के अंत में केंद्र ने अदालत से कहा कि भारतीय संदर्भ में पितृसत्ता और जेंडर स्टिरियोटाइप जैसे बाहरी विचारों को लागू करने से बचना चाहिए, क्योंकि ये भारत की मूल सामाजिक संरचना में कभी शामिल नहीं रहे.

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