सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) फाइल की गई है, जिसमें भारत के प्राइवेट कोचिंग इकोसिस्टम में बड़े सुधारों की मांग की गई है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि अनरेगुलेटेड कोचिंग सेंटर्स और 'डमी स्कूल' मॉडल की बढ़ती संख्या ने एक पैरेलल एजुकेशन सिस्टम बना दिया है, जो शिक्षा के अधिकार को कमजोर करता है. दरअसल Dummy School का चलन हाल ही के समय में काफी तेजी से बढ़ा है. JEE और NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कई छात्र रेगुलर स्कूल जाने की जगह डमी स्कूल में दाखिला लेते हैं. ताकि वो ज्यादा से ज्यादा समय कोचिंग में जाकर पढ़ाई कर सकें.
क्या होते हैं डीम स्कूल
सरल शब्दों में समझा जाए तो जिन छात्र का फोकस स्कूल जाने की जगह कोचिंग लेने पर होता है. वही डमी स्कूल में दाखिला लेते हैं. लेकिन इस व्यवस्था से कई छात्रों को नुकसान पहुंच रहा है. डमी स्कूल में दाखिल लेने वाले छात्र, स्कूल न जाने के बावजूद बोर्ड परीक्षा देने की पात्रता बने रहते है. छात्रों के डमी स्कूल चुनने का सिर्फ एक ही कारण होता है जो कि प्रतियोगी परीक्षा में अच्छे अंक लाना. डमी स्कूल चुनने से JEE, NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अधिक समय मिल जाता है.
आखिर क्यों इस तरह के स्कूल हैं खतरनाक?
कई एजुकेशन एक्सपर्ट डमी स्कूल को छात्रों के लिए खतरनाक मानते हैं. कई छात्र प्रतियोगी परीक्षा पर इतना ध्यान देते हैं कि बोर्ड परीक्षा के विषयों पर फोकस ही नहीं करते हैं. डमी स्कूल में दाखिला लेकर केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी पर जुट जाते हैं. ऐसे में कई बार बोर्ड के नंबरों पर भी असर पड़ता है. एजुकेशन एक्सपर्ट देव शर्मा ने डमी स्कूल कल्चर को खतरनाक बताया है. उन्होंने कहा कि डमी स्कूल कल्चर को रोकना जरूरी है. ऐसे करने के लिए 11वीं में भी बोर्ड एग्जाम जरूर होनी चाहिए. 11वीं में बोर्ड एग्जाम होने से डमी स्कूल कल्चर अपने आप बंद हो जाएगा. छात्रों का फोकस 11वीं में बोर्ड परीक्षा पर होगा.
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