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UGC के नियमों पर रोक के बाद क्या SC/ST भी नहीं कर पाएंगे शिकायत? जानें क्या होगा असर

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी नियमों से जुड़ी सुनवाई के दौरान समाज में बढ़ते जातिगत और क्षेत्रीय भेदभाव पर चिंता जताई है. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि रैगिंग के नाम पर खान-पान और संस्कृति का मजाक उड़ाना गलत है. कोर्ट ने इस मुद्दे की गहराई से समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाने का सुझाव दिया है ताकि कैंपस में समानता बनी रहे.

UGC के नियमों पर रोक के बाद क्या SC/ST भी नहीं कर पाएंगे शिकायत? जानें क्या होगा असर
UGC नियमों पर रोक के बीच सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग और जातिगत भेदभाव पर कड़ी चिंता जताई है.

Supreme Court statement on UGC New rule : कॉलेज कैंपस में होने वाली रैगिंग और भेदभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है. यूजीसी (UGC) के कुछ नियमों पर रोक लगने के बाद यह सवाल उठने लगा था कि क्या अब SC/ST और पिछड़े वर्ग के छात्र शिकायत नहीं कर पाएंगे? इसी मुद्दे पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने समाज के बदलते हालात पर गहरी चिंता जताई.

"क्या हम पीछे जा रहे हैं?" - CJI सूर्यकांत

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने समाज में बढ़ती दूरियों पर दुख जताते हुए पूछा कि आजादी के 75 साल बाद क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जो पीछे की तरफ जा रहा है? उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य एक ऐसा समाज बनाना था जहां कोई ऊंच-नीच न हो, लेकिन आज पहचान और जाति के नाम पर विभाजन बढ़ता दिख रहा है.

रैगिंग के मुद्दे पर बोलते हुए कोर्ट ने कहा कि आजकल दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर (North East) से आने वाले बच्चों को निशाना बनाया जाता है. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "भगवान के लिए! आज अंतर-जातीय शादियां हो रही हैं, हम भी हॉस्टल में रहे हैं जहां सब मिल-जुलकर रहते थे."

अदालत ने साफ किया कि अगर कोई छात्र अपनी संस्कृति या खान-पान साथ लाता है, तो उस पर टिप्पणी करना या उसे नीचा दिखाना कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए.

बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम अमेरिका के पुराने दौर जैसे न बन जाएं, जहां कभी अश्वेत और श्वेत बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल हुआ करते थे. कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर हमने सख्ती नहीं दिखाई, तो शरारती तत्व इस स्थिति का गलत फायदा उठा सकते हैं.

कमेटी बनाने का सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि इस पूरे मामले की समीक्षा के लिए कुछ प्रतिष्ठित लोगों की एक कमेटी बनाई जाए, ⁠ताकि समाज बिना किसी तरह के विभाजन के साथ आगे बढ़ सके और सभी मिलकर विकास कर सकें.

कोर्ट की इन टिप्पणियों से साफ है कि नियमों पर रोक का मतलब यह कतई नहीं है कि भेदभाव के खिलाफ कार्रवाई रुक जाएगी. कोर्ट चाहता है कि नियम और भी पुख्ता हों ताकि किसी भी छात्र के साथ जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर अन्याय न हो.

UGC के नियमों पर रोक के बाद क्या SC/ST भी नहीं कर पाएंगे शिकायत? 

इसका जवाब है, ऐसा बिल्कुल नहीं है. जानिए 2012 के क्या है  SC/ST केस्ट डिस्क्रिमेनेशन नियम

साल 2012 में UGC ने पहली बार देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए एक औपचारिक ढांचा तैयार किया था। इसका मकसद SC, ST, धर्म, जेंडर और भाषा के आधार पर होने वाले अन्याय को रोकना था.

2012 के नियमों की मुख्य बातें:अधिकारी की नियुक्ति:

इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल: कॉलेजों में एक खास सेल बनाना जरूरी था जो सबको बराबर मौके दे.

60 दिनों का वक्त: किसी भी शिकायत का निपटारा करने के लिए 60 दिन की समय सीमा तय की गई थी.

शिकायत का क्या था तरीका?

अगर किसी छात्र के साथ कुछ गलत होता, तो उसे 'एंटी-डिस्क्रमिनेशन ऑफिसर' को लिखित में शिकायत देनी होती थी. इसके बाद वह ऑफिसर मामले की जांच करता और अपनी रिपोर्ट कॉलेज प्रशासन को सौंपता. दोषी पाए जाने पर टीचर, स्टाफ या छात्र के खिलाफ यूनिवर्सिटी के नियमों के हिसाब से कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की जाती थी.

क्या इन नियमों में कोई कमी थी?

2012 के इन नियमों की एक सबसे बड़ी चर्चा यह रही कि इसमें 'झूठी शिकायतों' को लेकर कोई कड़ा प्रावधान नहीं था.

इसमें यह साफ नहीं किया गया था कि अगर कोई जानबूझकर गलत आरोप लगाता है, तो उसके खिलाफ क्या एक्शन होगा.

साथ ही, जांच का पूरा जिम्मा कॉलेज के अंदरूनी लोगों पर ही था, जिससे कई बार निष्पक्षता पर सवाल उठते थे.


 

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सुभाषिनी त्रिपाठी
Senior sub editor
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