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पैरों से 12वीं बोर्ड की परीक्षा दे रहा ये छात्र, पढ़ें दिव्यांग सूरज शिवराज की हौसलों से भरी कहानी

सूरज शिवराज के परिवार वालों को अपने बेटे पर काफी गर्व है. सूरज शिवराज के के माता-पिता के अनुसार उनके बेटे के पास ऑप्शन दिया था कि उसकी जगह कोई और परीक्षा लिख दे. लेकिन उसने खुद ही पेपर लिखने का फैसला किया.

पैरों से 12वीं बोर्ड की परीक्षा दे रहा ये छात्र, पढ़ें दिव्यांग सूरज शिवराज की हौसलों से भरी कहानी
सूरज ने अपनी 10वी की परीक्षा में 64 परसेंट नंबर हासिल किए थे.

इस समय महाराष्ट्र में 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा चल रही हैं. लाखों स्टूडेंट्स ये परीक्षा दे रहे हैं. इसी बीच एक छात्र का नाम काफी सुर्खियों में छाया हुआ है. क्योंकि ये छात्र अपने पैरों से पेपर दे रहा है. सूरज शिवराज उबाले के हाथ नहीं हैं. लेकिन हौसले पुरी तरह से बुलंद हैं. गाडेगांव गांव के रहने वाले उबाले, जिले के कंधार शहर के श्री शिवाजी कॉलेज का छात्र है और इस साल 12वीं की परीक्षा दे रहा है. सूरज शिवराज अपने पैरों से पेपर लिख रहा है, क्योंकि हाथ नहीं हैं. सूरज शिवराज को ये ऑप्शन दिया गया था कि उसकी जगह कोई और परीक्षा लिख सकता है. लेकिन सूरज शिवराज ने खुद ही परीक्षा लिखने का फैसला किया.

"बेटे पर गर्व है"

सूरज शिवराज के परिवार वालों को अपने बेटे पर काफी गर्व है. सूरज शिवराज के के माता-पिता के अनुसार उनके बेटे के पास ऑप्शन दिया था कि उसकी जगह कोई और परीक्षा लिख दे. लेकिन उसने खुद ही पेपर लिखने का फैसला किया. पहले दिन जब दूसरे कैंडिडेट्स और सुपरवाइज़र्स ने सूरज शिवराज को पेपरों से परीक्षा देते हुए देखा तो वौ हैरान हो गए. किसी को अपनी आंखों पर यकीन तक नहीं हुआ.

 सूरज शिवराज ने शांति से अपनी सीट पर बैलेंस बनाया, अपने पैरों की उंगलियों के बीच पेन पकड़ा और इंग्लिश का पेपर लिखना शुरू कर दिया. डिप्टी तहसीलदार उर्मिला कुलकर्णी, सेंटर सुपरिटेंडेंट अशोक वरपड़े, प्रिंसिपल मुरलीधर घोरबंद और दूसरे अधिकारियों ने उनके हिम्मत की तारीफ़ की.

सूरज के पिता शिवराज उबाले ने कहा, "मेरा बेटा जन्म से ही दिव्यांग है. वह अपने पैरों से खाता है. उसके पैर ही उसके हाथ हैं. उसने अपनी Class 10 की परीक्षा में 64 परसेंट नंबर हासिल किए थे. उसका संघर्ष समाज के लिए एक प्रेरणा है और मुझे उस पर गर्व है."

प्रिंसिपल घोरबंद ने कहा, "वह परीक्षा के लिए एक राइटर ले जा सकता था, लेकिन उसने अपनी दिव्यांगता को सम्मान और हिम्मत के साथ दूर करने का फैसला किया. उसका पक्का इरादा सच में तारीफ के काबिल है."

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