जब हौसले बुलंद हों और इरादे फौलादी, तो तंगहाली और मुश्किलें भी घुटने टेक देती हैं. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है जिला जींद के अहीरका गांव की बेटी दिव्या कारकी ने. दिव्या ने देश की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम नीट में 574 अंक हासिल कर ऑल इंडिया में 20,903वीं रैंक पर अपनी जगह बनाई है. दिव्या की इस सफलता ने साबित कर दिया है कि कामयाबी संसाधनों की मोहताज नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत और लगन की जरूत होती है.
दिव्या की यह सफलता इसलिए बेहद खास है क्योंकि उनके माता-पिता, दुर्गा बहादुर और जानुका, पिछले 15 वर्षों से जींद के एक निजी स्कूल में बतौर कुक (रसोइया) काम कर रहे हैं. दिन-रात तपने वाली गर्मी में दूसरों के लिए रोटियां सेकने वाले इस दंपति का सपना बस इतना था कि जो परेशानियां उन्होंने झेली हैं, वो उनकी बेटी को न देखनी पड़ें.

''बेटी डॉक्टर बन जाएगी सपने में नहीं सोचा था''
पिता दुर्गा बहादुर कहते हैं, "हम दिन-रात गर्मी में रोटी बनाते हैं. मैं हमेशा बेटी से कहता था कि तू बस ध्यान से पढ़ ले, ताकि तुझे कभी हमारी तरह दुखी न होना पड़े. लेकिन वो डॉक्टर बन जाएगी, यह तो हमने जिंदगी में कभी सपने में भी नहीं सोचा था.
दिव्या की मां जानुका ने बताया कि घर में जगह की कमी थी. हॉस्टल का माहौल होने के कारण बच्चों का आना-जाना और शोर-शराबा लगा रहता था. ऐसे में दिव्या ने घर के एक छोटे से स्टोर रूम को अपनी कर्मभूमि बनाया. वह दिन-रात में करीब 12 से 13 घंटे पढ़ाई करती थी. इस दौरान वह बीमार भी हुई और छोटी बहन की शैतानियों के बीच भी उसने सामंजस्य बिठाया.
"अच्छा तो लग रहा है, लेकिन अभी सफर जारी है ''
तीजों की रात को याद करते हुए पिता दुर्गा बहादुर भावुक हो जाते हैं. उन्होंने बताया कि रिजल्ट आने की खबर उन्हें शाम को ही मिल गई थी, लेकिन सर्वर डाउन होने की वजह से रिजल्ट खुल नहीं रहा था. करीब 11 मिनट बाद जब दिव्या को पता चला, तब तक पिता रिजल्ट देखने की जिद पर अड़े रहे. रात को करीब 1:00 बजे जब रिजल्ट खुला, उसके बाद ही पिता सुकून से सो पाए.
सुबह जब मां को बेटी की इस ऐतिहासिक सफलता का पता चला, तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले. मां जानुका कहती हैं, "अच्छा तो लग रहा है, लेकिन अभी सफर जारी है. बेटी का एडमिशन हो जाए और वो नौकरी पर लग जाए, तभी मन को असली शांति मिलेगी.

सहेली के साथ ने टूटने नहीं दिया
इस साल नीट परीक्षा को लेकर उपजे विवाद और 'री-नीट' की घोषणा ने दिव्या के लिए मानसिक तनाव जरूर पैदा किया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी. दिव्या ने बताया, "घंटों के हिसाब से पढ़ाई नहीं होती थी, बल्कि जब तक तय किया गया सिलेबस पूरा नहीं होता था, मैं पढ़ती रहती थी. री-नीट की वजह से स्ट्रेसफुल कंडीशन तो बनी, लेकिन माता-पिता के हार्ड वर्क और मेरी सहेली कृतिका के सपोर्ट ने मुझे टूटने नहीं दिया."
दिव्या हैं प्रेरणास्त्रोत
दिव्या की यह अटूट लगन और बेमिसाल कामयाबी आज जींद ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के उन लाखों स्टूडेंट्स के लिए एक प्रेरणा पुंज है, जो अभावों में भी बड़े सपने देखने का हौसला रखते हैं.
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