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आजाद तो हो गए....लेकिन आज भी गुलाम: इन 5 देशों की कहानी समझाती है भारत की आजादी की कीमत

फिलीपींस से लेकर लैटिन अमेरिका और मध्य एशिया तक, कई देशों ने स्वतंत्रता तो हासिल कर ली लेकिन उपनिवेशवाद का प्रभाव आज भी उनकी भाषा, धर्म और संस्कृति में दिखाई देता है. जानिए कैसे ये देश आज भी अपने अतीत की छाप ढो रहे हैं....

आजाद तो हो गए....लेकिन आज भी गुलाम: इन 5 देशों की कहानी समझाती है भारत की आजादी की कीमत
कुल मिलाकर इन देशों ने राजनीतिक स्वतंत्रता तो हासिल कर ली लेकिन उनकी सांस्कृतिक पहचान का बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए बदल गया.

आज भारत देश ने अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया. इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया. पूरा देश आज आजादी के जश्न में डूबा हुआ है. कहीं पर गीत-संगीत के माध्यम से आजादी की कहानियां सुनाई जा रही हैं, तो कहीं रंगमंच से किरदारों के जरिए देश को स्वतंत्रता दिलाने वालों के बलिदानों की वीरगाथा सुनाई जा रही है. स्कूल से लेकर दफ्तर आजादी के रंग में डूबे हुए हैं. इन सब कार्यक्रमों और जश्न के माहौल के बीच एक सवाल मन में जरूर आता है...आखिर स्वतंत्रता का असली मतलब क्या होता है? क्या केवल विदेशी शासन से मुक्ति ही आजादी है, या अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और पहचान को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है? बता दें दुनिया में कई ऐसे देश हैं जिन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता तो हासिल कर ली, लेकिन सदियों की गुलामी ने उनकी पहचान को इस हद तक बदल दिया कि उसके निशान आज भी साफ दिखाई देते हैं. आज के इस लेख में हम उन्हीं देशों पर एक नजर डालेंगे...जो आजाद तो हो गए लेकिन फिर भी किसी और कला-संस्कृति के आज भी गुलाम हैं....

फिलीपींस पर अंग्रेजी का असर कायम

फिलीपींस लगभग 333 वर्षों तक स्पेन और करीब 48 सालों तक अमेरिका के शासन के अधीन रहा. इस लंबे उपनिवेशवाद का सबसे गहरा असर वहां के धर्म पर पड़ा. जी हां, आज फिलीपींस एशिया का एकमात्र प्रमुख कैथोलिक देश माना जाता है, जहां लगभग 80 प्रतिशत आबादी कैथोलिक धर्म को मानती है. 

बता दें कि फिलीपींस का सिर्फ धर्म ही नहीं, भाषा भी बदल गई. स्पेनिश प्रभाव के बाद अमेरिकी शासन ने अंग्रेजी को शिक्षा और प्रशासन की भाषा बना दिया. आज भी अंग्रेजी वहां की आधिकारिक भाषाओं में शामिल है. इसका इस्तेमाल सरकारी कामकाज, हायर एजुकेशन और बिजनेस में विशेष रूप से किया जाता है. वहीं, फिलिपिनो का इस्तेमाल आम-बोल चाल और स्कूलों तक ही सीमित है. यही नहीं खान-पान, त्योहारों और पारिवारिक नामों में भी स्पेनिश और अमेरिकी प्रभाव साफ नजर आता है.

मेक्सिको, पेरू और बोलीविया- स्पेनिश पहचान हो गई हावी

ऐसे ही लैटिन अमेरिकी देशों पर लगभग 300 साल तक स्पेन का शासन रहा. जिसका परिणाम यह हुआ कि स्पेनिश भाषा वहां की मुख्य भाषा बन गई और अन्य कई भाषाएं कमजोर पड़ गईं या उनका अस्तित्व ही खत्म हो गया.

वहीं, यहां पर भी रोमन कैथोलिक धर्म प्रमुख बन गया. जिससे यहां की पारंपरिक मान्यताओं का प्रभाव कम होता चला गया. बता दें कि लैटिन अमेरिकी देशों जैसे- मेक्सिको, ब्राजील, पेरू और कोलंबिया में कैथोलिकों की बड़ी आबादी है.यहां की वास्तुकला, कानून, सामाजिक व्यवस्था और खान-पान तक में स्पेनिश असर साफ देखने को मिलता है. 

मध्य एशिया पर रूसी प्रभाव अब भी मौजूद

कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे देश दशकों तक सोवियत संघ का हिस्सा रहे. आज इन देशों के स्वतंत्र होने के बावजूद बड़े पैमाने पर प्रशासनिक कामों, शिक्षा और व्यापार में प्रमुख रूप से रूसी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है. 

कुल मिलाकर इन देशों की कहानी ये बताती है कि राजनीतिक स्वतंत्रता तो हासिल कर ली लेकिन सांस्कृतिक पहचान का बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए बदल गया. यही वजह है कि भारत की स्वतंत्रता केवल अंग्रेजों से सत्ता लेने की कहानी नहीं, बल्कि अपनी पहचान, संस्कृति और सभ्यता को बचाए रखने की भी कहानी है.

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