Jantar Mantar Student Protest FIR Controversey: दिल्ली में नीट पेपर लीक को लेकर हुए छात्र विरोध प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों पर एफआईआर (FIR) दर्ज होने के बाद यह सवाल चर्चा में है कि क्या एक बार दर्ज हुई FIR को वापस लिया या रद्द कराया जा सकता है. इसको लेकर एनडीटीवी (NDTV) ने सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता आरुषी कुलश्रेष्ठ से बात की. आरुषी ने एफआईआर से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया को सरल शब्दों में समझाया है, जिसके बारे में हम आगे डिटेल में बता रहे हैं-
शिकायतकर्ता FIR वापस नहीं ले सकता
अधिवक्ता आरुषी का कहना है कि भारत में एक बार दर्ज की गई FIR को सामान्यतः पुलिस द्वारा शिकायतकर्ता के कहने मात्र से वापस (withdraw) नहीं लिया जा सकता. FIR दर्ज होने के बाद वह राज्य (State) बनाम अभियुक्त की कार्यवाही बन जाती है. ऐसा होने पर कानून में कुछ ऐसे नियम हैं जिनके माध्यम से एफआईआर (FIR) को वापस और रद्द किया जा सकता है-
आरुषी बताती हैं कि एक बार FIR दर्ज होने के बाद शिकायतकर्ता यह नहीं कह सकता कि वह अपनी शिकायत वापस ले रहा है और FIR समाप्त हो जाए. यहां पर पुलिस का दायित्व है कि वह निष्पक्ष जांच करे और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करे
पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दे सकती है
अगर जांच के दौरान पुलिस को यह प्रतीत होता है कि कोई अपराध नहीं बनता, पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं या शिकायत असत्य है, तो पुलिस न्यायालय के समक्ष क्लोजर या फाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकती है. अंतिम निर्णय संबंधित मजिस्ट्रेट का होता है कि वह रिपोर्ट स्वीकार करें या आगे की कार्रवाई का आदेश दें.
हाई कोर्ट FIR रद्द कर सकता है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (पूर्व में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482) के अंतर्गत उच्च न्यायालय अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए FIR और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है, ऐसा तब होगा जब:
- FIR प्रथम दृष्टया कोई अपराध स्पष्ट नहीं करती
- कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग (abuse of process of law) है
- पक्षकारों के बीच विवाद का वास्तविक एवं स्वैच्छिक समझौता हो गया है (विशेषकर निजी/व्यक्तिगत प्रकृति के मामलों में)
- न्याय के हित में FIR को जारी रखना उचित न हो
समझौते से बन सकता है काम
- कंपाउंडल ऑफेंस (Compoundable offences) में न्यायालय विधि के अनुसार समझौते की अनुमति दे सकता है.
- नॉन कंपाउंडेबल (Non-compoundable offences) में भी उच्च न्यायालय, उपयुक्त परिस्थितियों में, अपने अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुए FIR रद्द कर सकता है, लेकिन यह तभी हो सकता है जब अपराध का प्रभाव मुख्य रूप से निजी हो और समाज पर गंभीर प्रभाव न पड़ता हो.
CJP प्रदर्शनकारियों पर सुप्रीम कोर्ट का क्या है रुख
आज, 28 जुलाई 2026 को, सर्वोच्च न्यायालय ने सीजेपी (Cockroach Janata Party) से जुड़े छात्र प्रदर्शनकारियों के मामलों में एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया. न्यायालय ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की “coercive action” (जबरन दमनात्मक कार्रवाई) फिलहाल न की जाए, अगर कानून के अनुसार FIR दर्ज की गई है तो वो स्वतः निरस्त नहीं होगा.
इस आदेश का क्या है मतलब
यह नहीं कहता कि दर्ज FIR स्वतः समाप्त या वापस हो गई हैं. इसका मतलब केवल इतना है कि:
- FIR का अस्तित्व बना रहेगा
- जांच कानून के अनुसार जारी रह सकती है
- लेकिन न्यायालय के अगले आदेश तक पुलिस गिरफ्तारी, दमनात्मक कार्रवाई और अन्य दबाव पूर्ण कदम नहीं उठाएगी (जिन व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान किया गया है)
- अंतिम रूप से FIR की वैधता, जांच या निरस्तीकरण का प्रश्न बाद में न्यायालय द्वारा तय किया जाएगा.
कुल मिलाकर यह आदेश इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि FIR दर्ज हो जाने मात्र से अनिवार्य रूप से गिरफ्तारी या दमनात्मक कार्रवाई आवश्यक नहीं होती, और उपयुक्त परिस्थितियों में संवैधानिक न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अंतरिम संरक्षण प्रदान कर सकते हैं.
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