
वाशिंगटन:
इंजीनियर बनने के सपने के साथ कॉलेजों में दाखिला लेने वाली महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम ही इस पेशे में बनी रह पाती हैं, क्योंकि वह खुद को अलग-थलग महसूस करने लगती हैं खासकर इंटर्नशिप या टीम आधारित शैक्षिक गतिविधियों के दौरान।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा है कि ऐसी स्थितियों में लिंग के आधार पर देखें तो पता चलता है कि सबसे चुनौतीपूर्ण कामों में पुरुषों को लगाया जाता है, जबकि महिलाओं को सामान्य कार्य और साधारण मैनेजेरियल जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं।
उन लोगों ने बताया कि टीम आधारित कार्य परियोजनाओं के दौरान भी ऐसा होता है और इस कारण ये पेशा उन्हें बहुत अधिक प्रभावित नहीं करता।
अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) की सुसान सिल्बे ने बताया, ‘‘इसमें निकलकर सामने आया है कि लिंग से बहुत अधिक अंतर पैदा हो जाता है। यह एक सांस्कृतिक घटना है।’’ परिणामस्वरूप बहुत अधिक महत्वाकांक्षा के साथ पेशे में आयी महिलाओं का इन अनुभवों के कारण पेशे से मोहभंग हो जाता है।
अनुसंधानकर्ताओं ने बताया कि इंजीनियर ग्रेजुएट की कुल 20 प्रतिशत डिग्री महिलाओं को मिलती है लेकिन केवल 13 प्रतिशत महिलाएं ही इस पेशे में बनी रह पाती हैं।
इस अध्ययन का प्रकाशन वर्क एंड ऑक्यूपेशन्स जर्नल में हुआ है।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा है कि ऐसी स्थितियों में लिंग के आधार पर देखें तो पता चलता है कि सबसे चुनौतीपूर्ण कामों में पुरुषों को लगाया जाता है, जबकि महिलाओं को सामान्य कार्य और साधारण मैनेजेरियल जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं।
उन लोगों ने बताया कि टीम आधारित कार्य परियोजनाओं के दौरान भी ऐसा होता है और इस कारण ये पेशा उन्हें बहुत अधिक प्रभावित नहीं करता।
अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) की सुसान सिल्बे ने बताया, ‘‘इसमें निकलकर सामने आया है कि लिंग से बहुत अधिक अंतर पैदा हो जाता है। यह एक सांस्कृतिक घटना है।’’ परिणामस्वरूप बहुत अधिक महत्वाकांक्षा के साथ पेशे में आयी महिलाओं का इन अनुभवों के कारण पेशे से मोहभंग हो जाता है।
अनुसंधानकर्ताओं ने बताया कि इंजीनियर ग्रेजुएट की कुल 20 प्रतिशत डिग्री महिलाओं को मिलती है लेकिन केवल 13 प्रतिशत महिलाएं ही इस पेशे में बनी रह पाती हैं।
इस अध्ययन का प्रकाशन वर्क एंड ऑक्यूपेशन्स जर्नल में हुआ है।
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