यह ख़बर 19 अप्रैल, 2012 को प्रकाशित हुई थी

भारत में कर कानून बदलाव के विरोध में अमेरिकी कारोबारी

खास बातें

  • दर्जन भर अमेरिकी कारोबारी समूहों ने अमेरिकी वित्त मंत्री टिमोथी गीथनर से कहा है कि वह भारत के सामने उनकी यह चिंता रखें कि भारत में कर कानूनों में कुछ प्रस्तावित बदलावों से उनके लिए निवेश का माहौल खराब होगा।
वाशिंगटन:

दर्जन भर अमेरिकी कारोबारी समूहों ने अमेरिकी वित्त मंत्री टिमोथी गीथनर से कहा है कि वह भारत के सामने उनकी यह चिंता रखें कि भारत में कर कानूनों में कुछ प्रस्तावित बदलावों से उनके लिए निवेश का माहौल खराब होगा।

कारोबारी समूहों ने मंगलवार को गीथनर को एक पत्र लिखकर कहा, "प्रस्तावित संशोधनों का हमारी कम्पनी, ग्राहकों और शेयरधारकों और भारत में निवेश करने वालों पर नकारात्मक असर होगा।"

केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के सामने उनकी चिंता रखने के लिए कहने वालों में अमेरिका चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स, अमेरिका-भारत व्यापार परिषद, फाइनेंशियल सर्विसेज फोरम जैसे समूह शामिल हैं।

मुखर्जी इस समय विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की सलाना वसंत बैठक में हिस्सा लेने के लिए वाशिंगटन में हैं। उनकी गुरुवार को गीथनर से द्विपक्षीय बैठक तय है।

कारोबारी समूहों ने कहा कि भारत के नए संशोधन प्रस्तावों में शामिल प्रतिगामी प्रभाव से कर वसूली, व्यापक और अस्पष्ट जनरल एंटी-एब्यूज रूल (जीएएआर) और परोक्ष शेयर हस्तांतरण पर करारोपण अंतर्राष्ट्रीय कर नीति और मानकों के अनुरूप नहीं है और इससे कानून के शासन की सोच को नुकसान पहुंचेगा।

उन्होंने कहा, "हम आपको इस सप्ताह विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की बैठक के दौरान यह मुद्दा उठाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।"

उन्होंने यह माना कि हर देश को कानून बनाने का अधिकार है लेकिन साथ ही कहा कि नए भारतीय कानून से कई तरह की समस्या आएगी। उन्होंने कहा कि वित्त विधेयक 2012 में दो दर्जन संशोधन होने हैं और इससे कम्पनियों के लिए 50 साल पीछे तक कर देयता पैदा हो सकती है।

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उन्होंने भारतीय अधिकारियों के इस तर्क को गलत कहा कि प्रतिगामी प्रावधान वैश्विक कर प्रचलन के अनुरूप है और कहा संशोधनों का दायरा काफी व्यापक है और यह काफी पुरानी अवधि तक के लिए प्रभावी हो सकता है।