नई दिल्ली:
मैंने कहीं पढ़ा था कि स्टीव जॉब्स का मानना था कि ग्राहकों से उनकी पसंद पूछकर प्रोडक्ट नहीं तैयार करने चाहिए, क्योंकि जितने दिनों में आप प्रोडक्ट को तैयार करेंगे, डिज़ाइन से लेकर प्रोडक्शन तक का वक्त गुजरेगा और तब तक ग्राहकों की पसंद बदल जाएगी और तब आप क्या करेंगे तो इसका विकल्प दिया गया था, एक उल्टी प्रक्रिया। आप ग्राहकों को बताइए कि उन्हें क्या चाहिए।
वक्त और ग्राहकों की पसंद कैसे बदल सकती है पहले पढ़िए और ग्राहकों के हाथ में सामान थमा दीजिए। अब यह फिलासफी मोबाइल फोन और लैपटॉप के लिए तो कारगर हो सकती है और कई तजुर्बे ऐसे हैं, जो बताते हैं कि तरीके कारगर हुए भी हैं, लेकिन वक्त और समाज ने दिलचस्प करवट ली है।
कुछ दिनों पहले अमेरिका में न्यूज इंडस्ट्री में एक प्रयोग के बारे मे सुना था। जब अखबार के संपादक अपने पाठकों को अपनी न्यूज मीटिंग में शरीक कर रहे थे। कोशिश थी कि ये समझा जाए कि पाठक किन खबरों के बारे में जानना चाहते थे। जहां पर पाठक अपनी राय देते थे। ये बताते थे कि उनके लिए कौन-सी खबर अहम है, कौन-सी नहीं। किस मुद्दे पर उन्हें कितनी जानकारी चाहिए और कितना ज्ञान। ये प्रक्रिया हालांकि छोटी और आसान लगती है, लेकिन होती जटिल है और ये केवल एक इलाके की बात नहीं। कुल मिलाकर वक्त सोशल मीडिया का हो गया है, जहां हर इंसान अपनी पसंद और नापंसद के बारे में कहीं ज्यादा जागरूक है। वह न सिर्फ़ एक धारणा रखने लगा है, वह अपने विचार जिसे चाहे उस तक तुरंत पहुंचाना चाहता है, सकता है और पहुंचा भी देता है। और इसी बदलाव को हमने गाड़ियों में तब्दीली लाते हुए देखा है।
पिछले टोक्यो मोटर-शो में कई कार कंपनियों से बातें हुईं तो लगा कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अब आम ग्राहकों से कहीं ज्यादा नजदीक से जुड़ने की कोशिश में लगी हुई हैं। कंपनी अपनी गाड़ियों के डिजाइन और फीचर या टेक्नॉलोजी के मामलात में आम ग्राहकों को पहले से ज्यादा जगह दे रही हैं। ग्राहकों को क्या चाहिए, किस तरीके की गाड़ी में चाहिए और कब चाहिए इन सवालों से कार कंपनियां रोज़ सामना करती हैं।
जैसे निसान ने अपनी कौंसेप्ट कारों को पेश किया था, उस वक्त कंपनी के मुखिया कार्लोस गोहन ने साफ़ कहा कि यह वक्त उन डिजिटल नेटिव्स का है, जिनका जन्म ही डिजिटल क्रांति के बाद हुआ था। इनकी दुनिया अलग है और इनकी पसंद अलग है। और कंपनी ने अपनी कारों को विकसित करने के दौरान ऐसे ही आम यंग कारप्रेमियों को अपनी प्रक्रिया में शामिल किया था। अब कंपनियां साफतौर पर ग्राहकों की पसंद को बिल्कुल नज़दीक से जानने में लगी हैं। और ये इसलिए भी आश्चर्यजनक बात लगती है, क्योंकि मैंने अपने पिता के स्कूटर बुकिंग की कहानियां सुनी हैं कि कैसे उन्हें सालों इंतज़ार करना पड़ा स्कूटर के लिए। जहां किसी के पास विकल्प नहीं था और कंपनियां निश्चिंत थीं। अब प्रतियोगिता ऐसी हो गई है कि कंपनियों की पूरी सोच ही पलट गई है।
आपको जैसे हार्ली डेविडसन के नए लॉन्च की बात याद होगी। जब कंपनी ने अब तक की सबसे छोटी 500 सीसी लिक्विड कूल्ड इंजन वाली मोटरसाइकिलें बना दीं। कई लोगों को आश्चर्य हुआ, क्योंकि लगता था कि अपने ब्रांड को लेकर साकांक्ष हार्ली डेविडसन भारी भरकम वाले सेगमेट से बाहर नहीं जाएगी या नीचे नहीं आएगी, लेकिन ऐसा हुआ और इसके पीछे कंपनी ने सीधे कहा कि दुनियाभर के तीन हजार ग्राहकों से सर्वे करने के बाद कंपनी को पता चला कि ग्राहक छोटी बाइक्स चाहते हैं। छोटे शहरी सफ़र में इंजन गर्म ना हो इसके लिए कंपनी ने लिक्विड कूल्ड इंजन बना दिया।
आज से कुछ साल पहले ग्राहकों की पसंद और उन पसंद के हिसाब से प्रोडक्ट इतनी जल्दी नहीं बनते थे। हां, कुछ कंपनियों द्वारा छोटे-मोटे सर्वे किए जाते थे, ये जानने के लिए कि ग्राहकों को पसंद क्या है? उनमें से कुछ लागू तो होते थे, लेकिन उनमें आमतौर पर छोटी-मोटी तब्दीलियां या मॉडिफ़िकेशन होती रहीं, असल डिज़ाइनिंग देश से बाहर बन रही थी, लेकिन अब यह स्थिति अलग हुई है। पहले बदलाव बहुत बाहरी होते थे, लेकिन अब ये फीडबैक बहुत गहरा जाता है तो इस भागीदारी को हम आगे भी बढ़ते ही देखेंगे, क्योंकि प्रतियोगिता भी बढ़ती जा रही है।