कमजोर रूपया की वजह से इलेक्ट्रॉनिक्स, पैक्ड फूड आइटम्स (तेल से तैयार), विदेश शिक्षा, यात्रा के लिए अधिक भुगतान करना होगा.
नई दिल्ली : अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वालों के लिए डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के मूल्य में लगातार गिरावट चिंता का विषय है. रुपया लगातार तीन सत्रों में गिरकर गुरुवार को सात पैसे की रिकवरी से पहले 79.81 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था. हालांकि, विदेशों में मजबूत अमेरिकी मुद्रा और विदेशी मुद्रा के लगातार आउटफ्लो की वजह से रूपए को फायदा नहीं मिल सका.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, गुरुवार को रुपया 9 पैसे की गिरावट के साथ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 79.90 के नए सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ था. यह 80 के मनोवैज्ञानिक स्तर से कुछ ही दूरी पर स्थित है.
ब्लूमबर्ग ने बुधवार को बताया था कि रुपया आखिरी बार 79.8788 प्रति डॉलर पर चल रहा था जो 80 अंक के करीब था.
रुपये में गिरावट का उपभोक्ताओं पर क्या असर होगा?
फरवरी में जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया तब से भारतीय मुद्रा 26 से अधिक बार नए निम्न स्तर पर पहुंच गई है. भारत की अर्थव्यवस्था आयात पर निर्भर है, इसलिए वो मुद्रास्फीति के दबाव में गिरते रुपये के असर को महसूस कर सकता है. यह उन परिवारों के खर्च करने के निर्णयों को प्रभावित कर सकता है जिनके पास कम पैसे बचे होंगे.
आयात की जाने वाली वस्तुओं के लिए भुगतान डॉलर में करना पड़ता है. इसलिए कमजोर रुपया होने से आयात करने वाले सामानों की कीमतें बढ़ जाती है.
इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर पैक्ड फूड आइटम्स (तेल से तैयार) तक के लिए उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी. उन्हें विदेश शिक्षा और यात्रा के लिए भी अधिक भुगतान करना होगा.
संयुक्त राज्य अमेरिका में शिक्षा की लागत और वहां की यात्रा पिछले छह महीनों में सात प्रतिशत बढ़ गई है. अब यदि रूपया और कमजोर हुआ तो उपभोक्ताओं पर दबाव बढ़ेगा.
रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण करने के कुछ दिनों बाद ही रूपए का पतन शुरू हो गया. यह मार्च में पहली बार 77 रूपए प्रति डॉलर पर पहुंच गया था. तब से लगभग हर दूसरे दिन कई प्रमुख मनोवैज्ञानिक सीमा स्तरों को तोड़ते हुए नए निम्न स्तर की ओर बढ़ रहा है.