आखिर वैश्विक स्तर पर भारत के गैर-बासमती चावल के प्रतिबंध का इतना असर क्यों, जानें

आईएमएफ के अर्थशास्त्री का कहना है कि मौजूदा स्थिति में इस प्रकार के प्रतिबंधों से बाकी दुनिया में खाद्य कीमतों में अस्थिरता पैदा होने की आशंका है और इसके बाद बाकी देश भी बदले में कोई कार्रवाई कर सकते हैं.

आखिर वैश्विक स्तर पर भारत के गैर-बासमती चावल के प्रतिबंध का इतना असर क्यों, जानें

भारत ने गैर-बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया.

नई दिल्ली:

भारत सरकार ने पिछले बृहस्पतिवार को गैर-बासमती चावल के निर्यात पर रोक लगा दी थी. विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने अधिसूचना में कहा, ‘‘गैर-बासमती सफेद चावल (अर्ध-मिल्ड या पूरी तरह से मिल्ड चावल, चाहे पॉलिश किया हुआ हो या नहीं) की निर्यात नीति को मुक्त से प्रतिबंधित कर दिया गया है.'' हालांकि, इसमें कहा गया था कि इस चावल की खेप को कुछ शर्तों के तहत निर्यात करने की अनुमति दी जाएगी. इसमें इस अधिसूचना से पहले जहाज पर चावल की लदान शुरू होना शामिल है. साथ ही इसमें कहा गया है कि अन्य देशों को उनकी खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार की मंजूरी और अन्य सरकारों के अनुरोध पर निर्यात की भी अनुमति दी जाएगी.

वैश्विक स्तर पर चिंता, आईएमएफ ने दिया बयान

भारत सरकार के इस कदम के बाद आईएमएफ से लेकर कई देशों में चिंता की लहर दौड़ गई है. आईएमएफ ने भारत से आग्रह तक कर लिया है कि वह अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करे. आईएमएफ का कहना है कि इससे वैश्विक मुद्रास्फीति पर असर पड़ सकता है. आईएमएफ के अर्थशास्त्री का कहना है कि मौजूदा स्थिति में इस प्रकार के प्रतिबंधों से बाकी दुनिया में खाद्य कीमतों में अस्थिरता पैदा होने की आशंका है और इसके बाद बाकी देश भी बदले में कोई कार्रवाई कर सकते हैं.

बैन चावल की निर्यात में 25 फीसदी हिस्सेदारी

गौरतलब है कि सरकार ने आगामी त्योहारों के दौरान घरेलू आपूर्ति बढ़ाने और खुदरा कीमतों को काबू में रखने के लिए गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है. खाद्य मंत्रालय ने कहा कि गैर-बासमती उसना चावल और बासमती चावल की निर्यात नीति में कोई बदलाव नहीं होगा. कुल निर्यात में दोनों किस्मों का हिस्सा बड़ा है. देश से निर्यात होने वाले कुल चावल में गैर-बासमती सफेद चावल की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है.

असामान्य मॉनसून का डर, कीमतें बढ़ीं

बता दें कि देश में जिन राज्यों में चावल का उत्पादन होता है, वहां असामान्य मॉनसून देखने को मिल रहा है. कहा जा रहा है कि इसके चलते चावल के उत्पादन में कमी की हो सकती है. यहीं कारण है कि इससे चावल कीमतें बढ़ने लगी है. बाजार का हाल यह है कि चावल की कीमतों में 20 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल हो चुका है.

चावल का उत्पादन हुआ कम

आंकड़े बताते हैं कि 2012-13 से ही हर साल देश में चावल का उत्पादन एक लाख टन से अधिक रहा है. साल 2021-22 में 129471 टन का उत्पदान हुआ था. वहीं, साल 2022-23 में यह आंकड़ा 136000 टन था. वर्ष 2023-24 में 134000 टन का उत्पादन हुआ है. यानी चावल का उत्पादन घटा है और सरकार की चिंता का कारण भी यही है.

बता दें कि भारत से गैर-बासमती सफेद चावल का कुल निर्यात वित्तवर्ष 2022-23 में 42 लाख डॉलर का हुआ था, जबकि इससे पिछले वर्ष में निर्यात 26.2 लाख डॉलर का था. भारत के गैर-बासमती चावल निर्यात के प्रमुख गंतव्यों में थाईलैंड, इटली, स्पेन, श्रीलंका और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं. विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) के अनुसार, ‘‘गैर-बासमती सफेद चावल (अर्ध-मिल्ड या पूरी तरह से मिल्ड चावल, चाहे पॉलिश किया हुआ हो या नहीं) की निर्यात नीति को मुक्त से प्रतिबंधित कर दिया गया है.''

मंत्रालय ने कहा, ‘‘उचित कीमतों पर पर्याप्त घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए गैर बासमती चावल की निर्यात नीति में संशोधन किया गया है.'' इस कदम का उद्देश्य आगामी त्योहारों में कम कीमतें और पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना है. घरेलू बाजार में गैर-बासमती सफेद चावल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और स्थानीय कीमतों में वृद्धि को कम करने के लिए, सरकार ने तत्काल प्रभाव से निर्यात नीति में संशोधन कर इसे '20 प्रतिशत के निर्यात शुल्क के साथ मुक्त' से 'निषेध' श्रेणी में कर दिया है.

पिछले कुछ महीनों में बाजार में चावल हुआ महंगा

बयान में कहा गया है, ‘‘चावल की घरेलू कीमतें बढ़ रही हैं. खुदरा कीमतें एक साल में 11.5 प्रतिशत और पिछले महीने में तीन प्रतिशत बढ़ी हैं. कीमत कम करने के साथ-साथ घरेलू बाजार में उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 8 सितंबर, 2022 को गैर-बासमती सफेद चावल पर 20 प्रतिशत का निर्यात शुल्क लगाया गया था. हालांकि, इस किस्म का निर्यात वित्तवर्ष 2022-23 की सितंबर-मार्च अवधि में बढ़कर 42.12 लाख टन हो गया, जो पिछले वित्तवर्ष की सितंबर-मार्च अवधि के दौरान 33.66 लाख टन था.

चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही में लगभग 15.54 लाख टन चावल का निर्यात किया गया, जो कि एक साल पहले की अवधि में केवल 11.55 लाख टन था, यानी इसमें 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

बताया जा रहा है, ‘‘निर्यात में इस तेज वृद्धि का कारण भू-राजनीतिक परिदृश्य, अल नीनो धारणा और अन्य चावल उत्पादक देशों में विषम जलवायु परिस्थितियों आदि के कारण अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई तेजी हो सकती है.''

गौरतलब है कि गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध से देश में उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम होंगी. हालांकि, गैर-बासमती चावल (उसना चावल) और बासमती चावल की निर्यात नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जो चावल निर्यात का बड़ा हिस्सा है. इसमें कहा गया है, ‘‘इससे यह सुनिश्चित होगा कि किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाभकारी कीमतों का लाभ मिलता रहेगा.''

हालांकि, इसमें कहा गया है कि इस चावल की खेप को कुछ शर्तों के तहत निर्यात करने की अनुमति दी जाएगी. इसमें इस अधिसूचना से पहले जहाज पर चावल की लदान शुरू होना शामिल है.

निर्यात पर खाद्य सुरक्षा को देखकर फैसला

इसमें कहा गया है कि अन्य देशों को उनकी खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार की मंजूरी और अन्य सरकारों के अनुरोध पर निर्यात की भी अनुमति दी जाएगी.

चावल के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत

तो भारत वैश्विक चावल व्यापार के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है. वैश्विक चावल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 40% से अधिक है. 2022 में भारत का चावल शिपमेंट अनाज के अगले चार बड़े निर्यातकों थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान और अमेरिका के संयुक्त शिपमेंट से अधिक था. और याद रखें 140 से अधिक देश भारत के गैर-बासमती चावल के शुद्ध आयातक हैं.

विदेशी बाजारों में जमाखोरी बढ़ी

जबकि भारत की अधिसूचना में कहा गया है कि अन्य देशों की खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति से कुछ निर्यात की अनुमति दी जाएगी...इसका असर विदेशों में पहले से ही चावल की जमाखोरी और घबराहट में खरीदारी के साथ-साथ कुछ किराना दुकानों द्वारा चावल की खरीद को सीमित करने के रूप में देखा जा सकता है.

बता दें कि एशिया में चावल की कीमतें पिछले तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं हैं. इससे दुनियाभर के लोगों के लिए भोजन की आपूर्ति के बारे में चिंता बढ़ गई.

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एशियाई बेंचमार्क थाई राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, थाई सफेद चावल 5% टूटा हुआ, अप्रैल 2020 के बाद से यह बढ़कर 572 डॉलर प्रति टन हो गया, जो सबसे महंगा स्तर है. यह दो सप्ताह पहले की तुलना में 7% की वृद्धि है.