खास बातें
- श्रम बाजार को मुक्त करने से विदेशी निवेश और रोजगार बढ़ने की उम्मीद
- इस सुधार से कंपनियों को नई नियुक्तियां करने में मदद मिलेगी
- अगले दो दशक में करीब 20 करोड़ भारतीय कामकाजी उम्र में पहुंच जाएंगे
नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी सरकार श्रम कानूनों में बड़ा बदलाव करने की योजना पर काम कर रही है, जिससे कंपनियों द्वारा कर्मचारियों की नियुक्ति और छंटनी (हायर और फायर) करना आसान हो जाएगा. श्रम मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने यह जानकारी देते हुए बताया कि इस नए कदम से लाखों नई नौकरियां पैदा होंगी.
साल 2014 में सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सुधार एजेंडे के तहत भारत के श्रम बाजार में बड़ा बदलाव करने की कोशिश की थी, लेकिन ट्रेड यूनियनों और सुधार से जुड़े अन्य विधेयकों की वजह से उस वक्त यह नहीं किया जा सका.
श्रम मंत्रालय के सचिव शंकर अग्रवाल ने बताया कि अगस्त में देश के सबसे बड़े टैक्स सुधार उत्पाद एवं सेवा कर (जीएसटी) के संसद से पास होने के बाद सरकार को लगता है कि यही सही वक्त है जब श्रम सुधारों को फिर से प्राथमिकता दी जाए.
शंकर अग्रवाल ने एक साक्षात्कार में कहा, 'हमें कानून में सुधार करना होगा. नौकरियों के लिए नियुक्ति करने के मामले में कंपनियां और नियोक्ताएं लचीलापन चाहते हैं.' उन्होंने कहा कि औद्योगिक संबंध और मजदूरी से जुड़े दो अहम विधेयकों को इस महीने कैबिनेट के पास भेजा जाएगा. कैबिनेट से इन्हें मंजूरी मिल जाती है तो फिर नवंबर से शुरू हो रहे संसद के अगले सत्र में इन्हें पेश किया जाएगा.
सरकार की तरफ से जिन नियमों में ढील दी जा सकती है वे श्रमिकों के लिहाज से काफी अहम हैं. दरअसल, बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटनी के लिए कंपनियों को सरकार से इजाजत की जरूरत होती है, जो कि सरकार मुश्किल से ही देती है. कंपनियों की शिकायत है कि इस नियम ने स्थायी नियुक्ति को हतोत्साहित किया और इसकी वजह से फैक्ट्रियों का आकार छोटा रहता है. इस शिकायत को ध्यान में रखते हुए नए कानून में अब इन प्रतिबंधों में छूट दी जा सकती है.
अग्रवाल ने कहा, 'यह प्राथमिकता तय करने का सवाल है. हमने सोचा कि यह काफी बढ़िया विचार होगा कि जीएसटी को पहले पेश किया जाए ताकि हम अपनी ऊर्जा गंवा न सकें.'
वहीं सरकार का कहना है कि श्रम बाजार को मुक्त करने से रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, विदेशी निवेश आएगा और कंपनियों को विस्तार करने का प्रोत्साहन मिलेगा.
हालांकि ट्रेड यूनियनों का कहना है कि इन सुधार से नौकरियों पर संकट पैदा हो जाएगा और कर्मचारियों के लिए यूनियन बनाना या फिर हड़ताल करना मुश्किल हो जाएगा. इन रिफॉर्म्स के तहत 44 श्रम कानूनों को मिलाकर चार नए लेबर कोड्स बनाए जाएंगे.
गौरतलब है कि अगले दो दशक में 20 करोड़ से अधिक भारतीय युवा कामकाजी उम्र में आ जाएंगे और इनके लिए रोजगार के अवसर पैदा करना सरकार के लिए बड़ी चुनौतियों में से एक माना जा रहा है.