यह ख़बर 27 जून, 2013 को प्रकाशित हुई थी

अर्थव्यवस्था के लिए बड़े जोखिम बढ़ रहे हैं : रिजर्व बैंक

खास बातें

  • शीर्ष बैंक ने अपनी द्विवार्षिक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) में कहा है, ‘‘पिछले छह महीने में अर्थव्यवस्था के वृहद स्तर पर जोखिम बढ़ा है। इसका कारण आर्थिक वृद्धि में गिरावट, बाह्य क्षेत्र की घटानएं तथा कंपनियों का प्रदर्शन है।’’
मुंबई:

रिजर्व बैंक ने गुरुवार को कहा कि भारत के समक्ष पिछले छह महीने में वृहत आर्थिक जोखिम बढ़े हैं। आर्थिक वृद्धि में गिरावट, बाह्य क्षेत्र की घटनाएं तथा घरेलू कंपनियों ढीला-ढाला प्रदर्शन इसके प्रमुख कारण हैं।

शीर्ष बैंक ने अपनी द्विवार्षिक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) में कहा है, ‘‘पिछले छह महीने में अर्थव्यवस्था के वृहद स्तर पर जोखिम बढ़ा है। इसका कारण आर्थिक वृद्धि में गिरावट, बाह्य क्षेत्र की घटानएं तथा कंपनियों का प्रदर्शन है।’’
रिपोर्ट में कहा गया है कि चालू खाते के उच्च घाटे (सीएडी) के लिए बड़े धन की जरूरत चिंता का कारण है और अर्थव्यवस्था इस मुद्दे पर दबाव में है। हाल में रुपये की विनिमय दर में गिरावट से यह बात साफ झलकती है। सीएडी वित्त वर्ष 2012-13 में 4.8 प्रतिशत रहा जो अब तक का उच्चतम स्तर है और बाह्य मोर्चे पर चिंता का प्रमुख कारण बना हुआ है।

परियोजनाओं में देरी तथा सरकार के स्तर पर निर्णय नहीं ले पाने के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में नरमी के कारण देश की आर्थिक 2012-13 में 5 प्रतिशत पर आ गई जो एक दशक का निम्न स्तर है।

एफएसआर रिपोर्ट के अनुसार आने वाले समय में सतत उच्च वृद्धि तथा वृहद आर्थिक स्थिरता के लिए राजकोषीय मजबूती के मामले में गुणवत्तापूर्ण सुधार महत्वपूर्ण होगा। निगमित क्षेत्र के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि उसका प्रदर्शन ‘कमजोर’ रहा है और कंपनियों द्वारा बाह्य उधारी बढ़ाए जाने जोखिमपूर्ण ऋण को लेकर चिंता जताई गई है।

रिजर्व बैंक की ताजा रपट में कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं। इनमें वैश्विक वृद्धि से जोखिम, घरेलू मुद्रास्फीति तथा राजकोषीय स्थिति में सुधार के रुझान का जिक्र किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वृद्धि में नरमी निम्न स्तर तक चली गई जबकि मुद्रास्फीति में भी गिरावट का रुख है। सोने की मांग पर अंकुश लगाने के उपायों का भी अच्छा परिणाम दिखाई दे रहा है। इससे चालू खाते के घाटे को कम करने में मदद मिल सकती है। शीर्ष बैंक ने कहा कि आर्थिक वृद्धि में नरमी घरेलू आपूर्ति में बाधार, नीतिगत अनिश्चितता, कमजोर निवेश धारणा तथा बाह्य मांग में सुस्ती का परिणाम है। इन सभी नकारात्मक कारकों में मुद्रास्फीति में गिरावट से ‘कुछ राहत’ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि संपत्ति गुणवत्ता तथा लाभदयकता के मामले में बैंकों का जोखिम बढ़ा है। हालांकि क्षेत्र की स्थिरता को लेकर विश्वास व्यक्त किया गया है।

इसमें चेतावनी दी गई है कि अगर चालू वृहद आर्थिक स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, बैंकों की ऋण गुणवत्ता में और गिरावट आ सकती है।

सकल-गैस निष्पादित परिसंपत्ति के मामले में बैंकों की स्थिति सुधरी है। जहां सितंबर 2012 तिमाही में यह 3.6 प्रतिशत थी वहीं मार्च 2013 तिमाही में 3.4 प्रतिशत हो गई। साथ ही पुनर्गठन के मामले में भी बैंकों की स्थिति बेहतर हुई है। यह 2013 की मार्च तिमाही में 5.7 प्रतिशत रही जो सितंबर में 5.9 प्रतिशत थी।

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रिपोर्ट में निर्यात क्षेत्र को मिलने वाले बैंक कर्ज में कमी को लेकर चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है, ‘‘हाल की तिमाहियों में निर्यात ऋण में कमी नीतिनिर्माताओं का ध्यान आकर्षित कर रहा है।’’