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This Article is From Jul 03, 2025

Ramayana to Mahabharat: रामायण से लेकर महाभारत तक, आखिर कैसे लौट आया धार्मिक फिल्मों का दौर

Ramayana to Mahabharat: प्रभास की ‘आदिपुरुष’ बुरी तरह फ्लॉप हो गई, लेकिन उसके कुछ ही समय बाद रणबीर कपूर की ‘रामायण’ पर तीन फिल्मों की सीरीज़ का ऐलान हुआ. 3 जुलाई को इसकी रिलीज डेट भी बताई जाएगी.

Ramayana to Mahabharat: रामायण से लेकर महाभारत तक, आखिर कैसे लौट आया धार्मिक फिल्मों का दौर
Ramayana to Mahabharat: क्यों बंद हुआ धार्मिक फिल्मों का बनाना और अब क्यों हो रही है इनकी वापसी ?
नई दिल्ली:

प्रभास की ‘आदिपुरुष' बुरी तरह फ्लॉप हो गई, लेकिन उसके कुछ ही समय बाद रणबीर कपूर की रामायण (Ramayana) पर दो फिल्मों की सीरीज का ऐलान हुआ. 3 जुलाई को इसकी रिलीज डेट भी बताई जाएगी. ‘बाहुबली' और ‘आर.आर.आर.' जैसी बड़ी फिल्में बनाने वाले एस.एस. राजामौली अब ‘महाभारत' बनाने की सोच रहे हैं. आमिर खान की भी इस विषय में दिलचस्पी है. इसी बीच दक्षिण भारत में बनी पैन इंडिया फिल्म ‘कन्नप्पा' रिलीज हो चुकी है और 18 जुलाई को ‘संत तुकाराम' हिंदी में सिनेमाघरों में आएगी.

धार्मिक और पौराणिक कहानियों पर बनने वाली फिल्मों का दौर हिंदी सिनेमा में काफी लंबे समय तक चला. लेकिन 1980 के दशक के बाद ये फिल्में लगभग बंद हो गईं. बीच-बीच में कुछ छोटे बजट की फिल्में आती रहीं लेकिन न ज्यादा चर्चे हुए, न ही ज्यादा कमाई. अब एक बार फिर माहौल बदला है, हिंदी सिनेमा फिर से भगवानों और पौराणिक कहानियों की तरफ लौट रहा है. अब ये फिल्में बड़े सितारों और भारी-भरकम बजट के साथ बन रही हैं, जो पहले कभी नहीं होता था. तो सवाल ये उठता है कि इतने सालों तक धार्मिक फिल्मों से दूरी क्यों बनी रही और अब अचानक क्यों उनकी वापसी हो रही है?

भारतीय सिनेमा की शुरुआत भी भगवानों की कहानियों से हुई थी

1913 में बनी भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र' एक पौराणिक कहानी पर ही थी. इसके बाद भी कई फिल्में ऐसी बनीं जो भगवानों, महापुरुषों और धार्मिक किरदारों पर आधारित थीं.

शुरुआती दौर की कुछ फिल्में सालों के हिसाब से ये हैं:
    •    राजा हरिश्चंद्र (1913)
    •    मोहिनी भस्मासुर (1913)
    •    सत्यवान सावित्री (1914)
    •    लंका दहन (1917)
    •    श्रीकृष्ण जन्म (1918)
    •    कालिया मर्दन (1919)
    •    बुद्धदेव (1923)
    •    सेतु बंधन (1932)
    •    गंगावतरण (1937)

आजादी के दौर में भी इन फिल्मों का सिलसिला चलता रहा
    •    भक्त प्रह्लाद (1942) – पहले तेलुगु में बनी, फिर 1946 में हिंदी में आई
    •    राम राज्य (1943)
    •    हर हर महादेव (1950)
    •    श्री गणेश महिमा (1950)
    •    शिव भक्त (1955)
    •    हनुमान (1958)
    •    सम्पूर्ण रामायण (1961)
    •    लव कुश (1963)
    •    श्रीकृष्ण अर्जुन युद्ध (1965)
    •    भगवान परशुराम (करीब 1970–72)
    •    जय संतोषी मां (1975)
    •    बजरंगबली (1976)

80 और 90 के दशक की बात करें तो जय बाबा अमरनाथ, नवरात्रि , हरि दर्शन, वीर भीमसेन जैसी धार्मिक फिल्में देखने को मिलीं. 1997 में एक फ़िल्म आई लव कुश जिसमें जितेंद्र और जयाप्रदा जैसे बड़े सितारे देखने को मिले .

बड़े स्टार इन फिल्मों से क्यों दूर रहते थे?

धार्मिक फिल्मों का बजट कम होता था और बड़े एक्टर्स को लगता था कि अगर उन्होंने किसी भगवान या भक्त का रोल कर लिया, तो लोग उन्हें उसी रूप में देखने लगेंगे. इससे उनकी बाकी फिल्मों पर असर पड़ सकता था. इसलिए इन फिल्मों में ज़्यादातर दारा सिंह और बंगाल के आशीष कुमार और कानन कौशल जैसे एक्टर्स ही नज़र आते थे. दारा सिंह ने करीब 19 पौराणिक फिल्मों में काम किया. कभी हनुमान बने, कभी शिव और कभी भगवान के भक्त.

आशीष कुमार ने करीब 25 ऐसी फिल्मों में काम किया, जिनमें ‘जय संतोषी मां' (1975) उनकी सबसे हिट फिल्म रही. कानन कौशल भी जय संतोषी मां में सत्यवती के मुख्य किरदार में थीं और  उन्होंने भी करीब 12 के आस पास माइथोलॉजी से प्रेरित फिल्में कीं लेकिन सबसे ज्यादा माइथोलॉजिकल या फिर इस से प्रेरित फिल्में कीं हैं अभिनेता महिपाल ने जिसकी संख्या करीब 40 फिल्मों के आस पास है.

दर्शकों का टेस्ट बदलने लगा

वक़्त बदल रहा था साथ ही दर्शकों का टेस्ट भी, 1980 के दशक में जब एक्शन और रोमांस की फिल्मों का दौर आया, तो धार्मिक फिल्में धीरे-धीरे पीछे हो गईं. सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनने लगीं. फिर टीवी आया और उसने रामायण और महाभारत जैसी कहानियों को घर-घर पहुंचा दिया. ये सीरियल इतने पॉपुलर हुए कि लोगों ने उनमें काम करने वाले कलाकारों को ही असली भगवान मान लिया. ऐसे में नए एक्टर्स को उन्हीं किरदारों में लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे और जो स्थापित एक्टर्स थे उन्हें लगा की वो अरुण गोविल, नीतीश भारद्वाज, दीपिका चिखलिया या इन धारावाहिकों के बाकी कलाकारों की छाप को मिटा नहीं पायेंगे इसलिए वो भी इनसे दूर ही रहे.

ग्लोबल सिनेमा का असर

1980 के आखिरी सालों में जब वीसीआर आया और फिर 90 के दशक में विदेशी चैनल भी आने लगे तो लोगों को तकनीक, विजुअल्स, तेज एडिटिंग और स्पेशल इफेक्ट्स में मजा आने लगा. अब हॉलीवुड फिल्में और उनके बड़े पैमाने पर बनाए गए सीन लोगों को लुभाने लगे , फिल्मकारों को लगा कम बजट में वो हॉलीवुड के वीएफएक्स के साथ मुकाबला नहीं कर पायेंगे और इस तरह भारतीय पौराणिक फिल्मों की चमक थोड़ी फीकी पड़ने लगी.

किसने दिखायी पौराणिक फिल्मों को दिशा

जब ‘बाहुबली' जैसी फिल्में सुपरहिट हुईं तो फिल्मकारों को फिर हिम्मत मिली कि भगवानों की कहानियों पर भी बड़े पैमाने पर फिल्में बनाई जा सकती हैं. अब उन्हें निवेश भी मिल रहा है, बड़े सितारे भी और शानदार वीएफएक्स तकनीक भी. इसी भरोसे पर ‘आदिपुरुष' बनी और अब ‘रामायण' की त्तीन फिल्मों की सीरीज़ बन रही है.

देश का मिजाज भी बदला तो सिनेमा भी 

हर दौर में सिनेमा पर देश के मिजाज का असर होता है. आज राम मंदिर का बनना, महाकुंभ की चर्चा और लोगों में अपनी जड़ों की तरफ लौटने की लहर साफ दिखाई दे रही है. यही सोच अब फिल्मों में भी दिख रही है. इसलिए पौराणिक फिल्में एक बार फिर चर्चा में हैं और हिंदी सिनेमा एक बार फिर भगवान की कहानियों की ओर लौट रहा है.

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