साल 1965 में रूपहले पर्दे पर एक ऐसी फिल्म आई, जिसने उस दौर के भारतीय सिनेमा की स्थापित परंपराओं को खुली चुनौती दी. यह फिल्म थी ‘गाइड'. 'गाइड' सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि एक ऐसा सिनेमाई चमत्कार था जिसने दुनिया को बता दिया कि भारतीय सिनेमा केवल गांव के मेलों और रोते-बिलखते मेलोड्रामा तक सीमित नहीं है. इस अमर फिल्म को बनाने वाले का नाम था- विजय आनन्द, जिन्हें फिल्म जगत प्यार से 'गोल्डी' कहता था. उस समय जब नायिकाओं को त्याग और मर्यादा की प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता था, ‘गाइड' ने रोज़ी जैसे किरदार को सामने रखा. रोज़ी अपने घुटन भरे वैवाहिक जीवन को अस्वीकार कर अपने प्रेम और अपने जुनून नृत्य को चुनने का साहस करती है. वह सामाजिक बंधनों की परवाह किए बिना अपने सपनों के लिए घर की दहलीज लांघ जाती है.
फिल्म का दूसरा प्रमुख पात्र है राजू गाइड, जिसे देव आनंद ने जीवंत किया. बातूनी और चतुर टूरिस्ट गाइड राजू हालात के थपेड़ों के बीच धीरे-धीरे बदलता है. वह पहले एक अवसरवादी बनता है, फिर एक अपराधी और अंत में अनजाने में एक ऐसे आध्यात्मिक संत के तौर पर स्थापित हो जाता है, जो गांव में वर्षा के लिए उपवास करता है. मानव स्वभाव के लालच, प्रेम, विश्वास और मोक्ष की जटिल पड़ताल करती यह दार्शनिक कथा केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा में विचार और अभिव्यक्ति की नई दिशा का आरंभ थी. यही ‘गाइड' विजय आनंद की रचनात्मक दृष्टि और साहसिक फिल्मनिर्माण की सबसे प्रभावशाली मिसाल बनकर आज भी याद की जाती है.
अगर 1950 और 60 के दशक के भारतीय सिनेमा को एक कैनवास मान लिया जाए, तो विजय आनंद वो ब्रश थे, जिसने गांव के मेलों और रोते-बिलखते मेलोड्रामा के बीच पहली बार आधुनिकता, रहस्य और शहरी स्वैग के सबसे चटक रंग उकेरे. उन्होंने 23 साल की उम्र में 'नौ दो ग्यारह' (1957) जैसी फिल्म मात्र 40 से 45 दिनों में बनाकर पूरी इंडस्ट्री को चौंका दिया.
भांजी से की शादी
70 के दशक में विजय आनंद का ओशो (आचार्य रजनीश) के आध्यात्मिक प्रभाव में आना और फिर अपनी भांजी (बड़ी बहन की बेटी) सुषमा से शादी करना, यह एक ऐसा कदम था जिसने उस दौर में भारी हंगामा खड़ा कर दिया था. परिवार और समाज के कड़े विरोध के बावजूद, उन्होंने ने परवाह नहीं की. उन्होंने अपनी शर्तों पर प्यार किया और जीवन के अंतिम दिन तक सुषमा के साथ एक बेहद खुशहाल वैवाहिक जीवन बिताया.
बॉलीवुड को दिया 'अर्बन हीरो'
उस दौर में जहां नायक खेतों में पसीना बहाते दिखते थे, विजय आनंद ने बॉलीवुड को 'ट्वीड जैकेट, हैट और सिगार' वाला एक 'अर्बन हीरो' दिया. उनके बड़े भाई देव आनंद इस शहरी आकर्षण के सबसे बड़े चेहरे बने. गोल्डी को एक फ्रेम की 'ज्योमेट्री' किसी भी अन्य निर्देशक से बेहतर समझ आती थी.
जब आप 'ज्वेल थीफ' (1967) देखते हैं, तो आप भारत के अल्फ्रेड हिचकॉक से मिल रहे होते हैं. कैमरे का लकड़ी के दरवाजों के बीच से झांकना, 'छठी उंगली' वाला वो सस्पेंस से भरा दृश्य जहां देव आनंद मुस्कुराते हुए अपने जूते उतारते हैं, यह दर्शक की नसों के साथ खेलने की गोल्डी की अद्भुत कला थी.
अपनी फिल्मों की एडिटिंग खुद करते थे
विजय आनंद की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे अपनी फिल्मों की एडिटिंग (संपादन) खुद करते थे. इसलिए वे सेट पर सिर्फ उतना ही शूट करते थे, जितनी की जरूरत होती थी. गानों को कहानी में पिरोने में उनका कोई सानी नहीं था.
याद कीजिए 'तीसरी मंजिल' का 'ओ हसीना जुल्फों वाली' गाना, जिसमें आरडी बर्मन के जैज संगीत पर उनके कट और कैमरे के एंगल एकदम सटीक बैठते थे. या 'तेरे घर के सामने' का 'दिल का भंवर करे पुकार', कुतुब मीनार की सीढ़ियों के क्लॉस्ट्रोफोबिक माहौल में रोमांस को कैमरे में कैद करना एक जीनियस ही कर सकता था. उन्होंने गानों को फिल्म रोकने का जरिया नहीं, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने का टूल बना दिया था.
जहां उनके भाई देव आनंद एक 'लार्जर-देन-लाइफ' सुपरस्टार थे, वहीं विजय आनंद स्वभाव से थोड़े अंतर्मुखी थे. जब वे कैमरे के सामने आए, तो उन्होंने 'कोरा कागज' और 'तेरे मेरे सपने' में बेहद संवेदनशील और जटिल किरदार निभाए. 90 के दशक के बच्चों को वे आज भी टीवी सीरियल 'तहकीकात' के उस चतुर लेकिन अजीबोगरीब 'डिटेक्टिव सैम डिसिल्वा' के रूप में याद हैं.
फरवरी 2004 को 70 वर्षीय विजय आनंद को हार्ट अटैक आया और उन्हें मुंबई के लीलावती अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टरों ने पहले ही उन्हें बाईपास सर्जरी की सलाह दी थी, लेकिन अपनी शर्तों पर जीने वाले गोल्डी ने अपने शरीर के साथ कोई भी छेड़छाड़ (सर्जरी) करवाने से इनकार कर दिया था. 23 फरवरी 2004 की सुबह वे इस दुनिया को छोड़ चले.
विजय आनंद को गाइड (1965) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ डायलॉग पुरस्कार मिले. जॉनी मेरा नाम (1970) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संपादन व स्क्रीनप्ले और बीएफजेए सर्वश्रेष्ठ संपादक सम्मान प्राप्त हुआ. डबल क्रॉस (1973) के लिए भी बीएफजेए सर्वश्रेष्ठ संपादक पुरस्कार मिला.
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