हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे संगीतकार हुए, जिन्होंने अपनी धुनों और हुनर से संगीत को नई पहचान दी, लेकिन उन्हें वह लोकप्रियता नहीं मिली जिसके वे हकदार थे. ऐसे ही कलाकारों में एक नाम सज्जाद हुसैन का भी है. उन्हें बेहतरीन संगीतकार होने के साथ-साथ 22 हजार से ज्यादा गानों में मैंडोलिन बजाने के लिए भी याद किया जाता है. हालांकि उनकी पहचान सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं रही. साफगोई, समझौता न करने वाला स्वभाव और बेबाक बयान अक्सर उन्हें विवादों के केंद्र में ले आते थे. यही वजह रही कि शानदार प्रतिभा के बावजूद उनका करियर उतनी ऊंचाई तक नहीं पहुंच सका, जितनी उनके हुनर से उम्मीद की जाती थी.
बेबाकी के कारण कई दिग्गजों से बिगड़े रिश्ते
सज्जाद हुसैन ने 1940 के दशक से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाई. कहा जाता है कि फिल्म ‘दोस्त' की सफलता का श्रेय जब अभिनेत्री नूरजहां को दिया गया, तो उन्होंने दोबारा उनके लिए संगीत तैयार न करने का फैसला कर लिया. रिकॉर्डिंग के दौरान गीतकार डी.एन. मधोक से भी उनका विवाद हुआ. इतना ही नहीं, लता मंगेशकर के गायन को लेकर की गई एक टिप्पणी के बाद दोनों के रिश्तों में दूरी आ गई. अभिनेता दिलीप कुमार के साथ भी उनकी अनबन की चर्चा रही. अपने तीखे अंदाज के चलते उन्होंने तलत महमूद और किशोर कुमार पर भी कटाक्ष किए, जिसके कारण इंडस्ट्री में उनकी छवि एक बेहद सख्त और बेबाक संगीतकार की बन गई.
अंतिम यात्रा में फिल्म इंडस्ट्री से पहुंचे सिर्फ दो लोग
संगीत के प्रति उनकी परफेक्शन और किसी भी तरह का समझौता न करने की आदत का असर उनके करियर पर भी पड़ा. कहा जाता है कि उन्होंने अपने लंबे सफर में कई बड़े फिल्म प्रोजेक्ट खो दिए. खुद लता मंगेशकर ने भी एक इंटरव्यू में माना था कि सज्जाद हुसैन के साथ काम करना चुनौतीपूर्ण होता था, क्योंकि वे हर सुर और हर बारीकी पर विशेष ध्यान देते थे. 21 जुलाई 1995 को उनके निधन के बाद जब अंतिम यात्रा निकली, तब परिवार के सदस्यों के अलावा फिल्म इंडस्ट्री से केवल गायक पंकज उधास और संगीतकार खय्याम ही उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे. यह घटना आज भी हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास के सबसे भावुक अध्यायों में गिनी जाती है.
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