हिंदी सिनेमा में कई ऐसे गाने हुए जो ना तो सिर्फ हिट हुए बल्कि उनके पीछे की कहानी और भी दिलचस्प रही है. आज हम आपको एक ऐसे ही गाने के बारे में बताएंगे जो सालों पहले तैयार हुआ लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं हुआ. कई दिनों तक गुमनामी में खोए इस गाने ने सालों बाद एक फिल्म में जगह मिली और फिर ये ऐसा हिट हुआ कि रिलीज के 30 साल बाद भी लोगों की प्लेलिस्ट में अपनी जगह बनाए हुए है. हम बात कर रहे हैं साल 1994 में आई सुनील शेट्टी की फिल्म 'मोहरा' के गीत 'ना कजरे की धार, न मोतियों के हार'. इस गाने से जुड़ा एक बहुत ही दिलचस्प किस्सा है, जिसके बारे में शायद ही लोगों को पता हो.
कब आया था गाना
सुनील शेट्टी की यादगार फिल्मों में 'मोहरा' भी शामिल है. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा दिया था. सिर्फ फिल्म ही नहीं बल्कि इसके गाने भी काफी लोकप्रिय हुए. फिल्म का गाना 'ना कजरे की धार, ना मोतियों के हार' तो आज भी लोगों की प्लेलिस्ट में शामिल है. क्या आपको पता है कि ये गाना सुनील शेट्टी के जन्म से ठीक एक साल पहले ही रिकॉर्ड हो गया था, लेकिन इसको जगह मिली सुनील शेट्टी की फिल्म में, जिसे पंकज उधास ने अपनी आवाज से अमर बना दिया.
सुनील शेट्टी के पैदा होने से पहले बनकर तैयार था आइकॉनिक गीत
सुनील शेट्टी की फिल्म मोहरा साल 1994 में रिलीज हुई थी. इसका गाना ना कजरे की धार आज भी आइकॉनिक गानों में से एक है. इस गाने का इस्तेमाल लोग अपनी महबूबा की तारीफ के लिए इस्तेमाल करते हैं. इस गाने की खास बात जो इसे सबसे अलग बनाती है, वो ये है कि इस गाने को तब तैयार किया गया था जब सुनील शेट्टी का जन्म भी नहीं हुआ था.
किस फिल्म के लिए बना था गाना
आपको बता दें कि इस गाने को मुकेश ने एक ऐसी फिल्म के लिए गाया था, जो बाद में कभी रिलीज ही नहीं हुई. इस गाने का संगीत कल्याणजी वीरजी शाह ने तैयार किया था. बाद में विजू शाह ने इस गाने को फिर से तैयार किया और इसे पंकज उधास की आवाज में रिकॉर्ड कराया. विजू शाह ने यह गाना 1971 में पहली बार सुना था और तभी से उन्हें यह बेहद पसंद था.
निर्देशक सुल्तान अहमद जब भी कल्याणजी के घर आते थे, तो अक्सर इस गाने को सुनने की फरमाइश करते थे. उन्हें यह गाना बहुत पसंद था और वे इसे अपनी किसी फिल्म में इस्तेमाल करना चाहते थे. लेकिन उन्हें कभी ऐसी कहानी या सीन नहीं मिला, जहां यह गाना फिट बैठ सके. कई साल बाद विजू शाह ने यह गाना राजीव राय को सुनाया. असली गाना काफी स्लो था, इसलिए विजू ने उसमें नए सिंथेसाइजर और मॉर्डन म्यूजिक जोड़कर उसे नया रूप दिया. जब राजीव राय ने पहली बार इसे सुना, तो उन्हें यह खास पसंद नहीं आया. उन्होंने विजू से कहा कि कोई दूसरा गाना सोचते हैं.
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फिल्म नहीं हुई रिलीज
दरअसल, तीन दशकों से सुना जाने वाला ये गाना कल्याण जी और आनंद ने कंपोज किया था, जो 60s की मशहूर जोड़ियों में से एक थे. गाने को मुकेश ने आवाज ने दी थी. यह गाना बनकर तैयार तो हो गया, तो दुर्भाग्यवश ये जिस फिल्म के लिए बना था, वह कभी पूरी ही नहीं हो पाई और गीत धरा का धरा रह जाता है.
गीतकार ही भूल गया था अपना गीत
लेकिन विजू शाह ने उनसे कहा कि कुछ दिन तक यह गाना बार-बार सुनिए, फिर फैसला कीजिए. कुछ दिनों बाद राजीव राय वापस आए और माना कि यह गाना वाकई एक नगीना है. अब समस्या यह थी कि असली गाना सिर्फ मुकेश का सोलो था. इसलिए गाने में फीमेल आवाज का हिस्सा जोड़ने के लिए एक गीतकार की जरूरत थी. विजू शाह ने इंदीवर से संपर्क किया और उनसे महिला हिस्से के लिए बोल लिखने को कहा.
इंदीवर, कल्याणजी-आनंदजी के बहुत करीबी थे, इसलिए उन्होंने कहा कि वे यह काम मुफ्त में कर देंगे. वे आए और उन्होंने महिला हिस्से के लिए नए बोल लिख दिए. इसके बाद विजू शाह ने इंदीवर को एक दिलचस्प बात बताई. उन्होंने कहा कि इस गाने के मूल बोल भी इंदीवर ने ही कई साल पहले लिखे थे. यह सुनकर इंदीवर खुद हैरान रह गए. उन्हें याद ही नहीं था कि उन्होंने 1970 के दशक में यह गाना लिखा था. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस गाने के लिए वे नए बोल लिख रहे हैं, उसके असली गीतकार भी वही थे.
पंकज उधास ने 33 साल बाद गाया
विजू शाह ने 'ना कजरे की धार, ना मोतियों के हार' गाने को रिक्रिएट किया और साल 1994 में रिलीज हुई फिल्म 'मोहरा' में इस गाने को पंकज उधास ने अपनी आवाज से सजाया. इस गाने को पंकज के साथ साधना सरगम ने अपनी आवाज से सजाया और वो गाना जो कहीं खो गया था सालों बाद कल्ट गानों में शामिल हो गया.
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