फिल्म संगीत जगत की ऐसी हस्ती जिन्हें प्रशंसक कभी भुला नहीं सकते. जी हां! बात हो रही है महान संगीतकार नौशाद अली की, जिनका जीवन संघर्ष, सफलता का मिश्रण रहा. 5 मई को उनकी पुण्यतिथि है. उनके जीवन में एक यादगार और भावुक क्षण 5 अक्टूबर 1952 का था, जब दादर के ब्रॉडवे थिएटर में उनकी फिल्म बैजू बावरा का प्रीमियर चल रहा था. हॉल के बाहर बालकनी में खड़े नौशाद फफक-फफक कर रो रहे थे. निर्देशक विजय भट्ट ने जब उनसे पूछा, “नौशाद साहब, आप रो क्यों रहे हैं?” नौशाद ने आंसू पोछते हुए जवाब दिया, “फुटपाथ के उस पार से इस थिएटर तक आने में मुझे 16 बरस लग गए.” यह जवाब नौशाद की संघर्ष भरी जिंदगी के दर्द और सफलता के गर्व दोनों के लिए था.
गरीबी और मुफलिसी के दिनों से निकलकर उन्होंने फिल्म संगीत की दुनिया में एक अनुपम इमारत खड़ी की थी. नौशाद अली का जन्म 25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में हुआ था. उनके पिता वाहिद अली अदालत में मुंशी थे. बचपन में देवा शरीफ की दरगाह पर कव्वालियां सुनकर उनका मन संगीत की ओर झुक गया. उन्होंने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत का सुंदर मेल अपने फिल्मी गीतों में किया, जिसकी वजह से आज भी उनका संगीत अमर है.
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बैजू बावरा नौशाद का सबसे बड़ा काम माना जाता है. फिल्म में 'झूले में पवन', 'आज गावत मन में' जैसे गाने आज भी लोकप्रिय हैं. इसी फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला. इसके बाद मदर इंडिया, मुगल-ए-आजम, गंगा जमुना और मेरी महबूब जैसी फिल्मों में उन्होंने जादुई संगीत दिया. मुगल-ए-आजम का “प्यार किया तो डरना क्या” आज भी रोमांटिक गीतों में सबसे ऊपर गिना जाता है. मदर इंडिया का “मतवाला जिया डोले” और राम और श्याम का “आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले” भी उनके बेहतरीन कामों में शामिल हैं.

नौशाद ने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मुकेश और सुरैया जैसे गायकों को खूबसूरत गाने दिए. उन्होंने गुलाम मोहम्मद के अधूरे संगीत को पूरा करके पाकीजा के गाने भी तैयार किए. कुल मिलाकर उन्होंने सौ से कम फिल्मों में काम किया, लेकिन कई फिल्में सिल्वर जुबली, गोल्डन जुबली मनाने में सफल रहीं. उनके संगीत में लोक की खुशबू, शास्त्रीय की गहराई और पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा की चमक तीनों ही दिखाई देते थे. अनमोल घड़ी, शाहजहां, आन, दास्तान और साथी जैसी फिल्में इसके बेहतरीन उदाहरण हैं.
संगीत की सेवा के लिए उन्हें 1992 में पद्मभूषण और 1981 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया. उनके नाम पर डाक टिकट भी जारी किया गया. उन्होंने शायरी भी लिखी और “आठवां सुर” नामक किताब भी प्रकाशित की. 5 मई 2006 को इस महान संगीतकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके गाने आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं.
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