भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में जब भी महान फिल्म मेकर्स का जिक्र होता है, तो महबूब खान का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है. एक ऐसा फिल्मकार, जिसने गरीबी, संघर्ष और लगातार ठुकराए जाने के बावजूद हार नहीं मानी और आगे चलकर दुनिया को ‘मदर इंडिया' जैसी क्लासिक और बेहतरीन फिल्म दी. हालांकि, गांव से मुंबई तक का सफर आसान नहीं था. कभी ऐसा समय था जब निर्माता उनकी स्क्रिप्ट सुनकर हंसते थे और मुंह पर दरवाजा बंद कर देते थे, लेकिन महबूब खान ने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया.
ट्रेन पकड़कर फिल्म देखने जाते थे महमूद
महबूब खान का जन्म 9 सितंबर 1906 को गुजरात के बड़ौदा के पास सरार गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था. बचपन से ही उन्हें फिल्मों का बेहद शौक था. वह अक्सर ट्रेन पकड़कर आसपास के शहरों में फिल्में देखने चले जाते थे और फिर चुपचाप घर लौट आते थे. परिवार को लगता था कि वह यूं ही इधर-उधर घूमते रहते हैं, लेकिन उनके भीतर सिनेमा को लेकर एक अलग ही जुनून पल रहा था.
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पेरेंट्स ने कर दी जबरन शादी
जवानी के दौर में आते-आते महबूब खान ने खुद को हीरो बनाने का दृढ़ संकल्प ले लिया और मुंबई जाकर फिल्मों में काम करने का फैसला भी कर लिया. हालांकि, यह खबर जब पिता को लगी तो वह उन्हें वापस घर ले आए और उस दिन उनकी पिटाई भी हुई. यहीं नहीं बेटे के भविष्य को देखते हुए जबरन शादी भी कर दी गई. यह सोच कर कि वह सुधर जाएंगे और सिनेमा के अपने जुनून को त्याग देंगे. महबूब खान एक बेटे के पिता भी बन गए. लेकिन, समय के साथ फिल्मों के प्रति उनका लगाव और भी गहराता गया और आखिरकार लाख कोशिशों के बाद वह दोबारा मुंबई पहुंच गए और स्टूडियो के बाहर काम मांगने लगे.
निर्देशन में आजमाया हाथ

मुंबई में महबूब खान वीटी स्टेशन के पास ज्योति स्टूडियोज के बाहर घंटों खड़े रहते, शुरुआती दिनों में उन्होंने काफी संघर्ष किया. कई रातें रेलवे प्लेटफॉर्म पर गुजारनी पड़ीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. समय तेजी से आगे बढ़ता गया और मुंबई में उनकी मुलाकात फिल्म मेकर अर्देशिर ईरानी से हुई, जिन्होंने उन्हें फिल्मों में छोटे-छोटे रोल दिए. महबूब खान ने अपने करियर की शुरुआत बतौर एक्स्ट्रा कलाकार की थी. धीरे-धीरे उन्हें छोटे किरदार मिलने लगे, यही नहीं एक फिल्म से तो उन्हें निकाल भी दिया गया था. लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि उनकी असली ताकत अभिनय नहीं, बल्कि कहानी कहने और निर्देशन में है.
स्क्रिप्ट सुनकर उड़ाते थे मजाक
इसके बाद उन्होंने अपनी कहानियां लिखनी शुरू कीं और अलग-अलग प्रोड्यूसर्स के पास जाने लगे. उस दौर में कई निर्माता उनकी स्क्रिप्ट सुनकर मजाक उड़ाते थे. कोई उनकी बात गंभीरता से नहीं लेता था. लेकिन लगातार कोशिशों के बाद 1935 में उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘अल हिलाल' रिलीज हुई. फिल्म को अच्छी प्रतिक्रिया मिली और यहीं से महबूब खान के सफल सफर की शुरुआत हुई. इसके बाद उन्होंने ‘एक ही रास्ता', ‘औरत', ‘रोटी', ‘अनमोल घड़ी', ‘अंदाज', ‘आन' जैसी कई शानदार फिल्मों का निर्देशन किया. उनकी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों और मजबूत महिला किरदारों को खास महत्व दिया जाता था. यही वजह है कि उन्हें भारतीय सिनेमा का प्रगतिशील और स्त्रीवादी फिल्मकार भी माना जाता है.
मदर इंडिया से चमकी किस्मत
महबूब खान ने केवल फिल्में ही नहीं बनाईं, बल्कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को ‘महबूब स्टूडियो' जैसा आधुनिक स्टूडियो भी दिया. उस दौर में यह स्टूडियो हॉलीवुड स्टाइल की सुविधाओं वाला आधुनिक स्टूडियो माना जाता था. साल 1957 में रिलीज हुई ‘मदर इंडिया' महबूब खान के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि साबित हुई. नरगिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राजकुमार जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाती है. यह फिल्म एक मां के संघर्ष, त्याग और आत्मसम्मान की कहानी थी. खास बात यह है कि ‘मदर इंडिया' उनकी ही पुरानी फिल्म ‘औरत' का नया रूप थी. ‘मदर इंडिया' को ऑस्कर अवॉर्ड के लिए भी नॉमिनेट किया गया था. हालांकि, फिल्म पुरस्कार जीत नहीं सकी, लेकिन इसने दुनियाभर में भारतीय सिनेमा को नई पहचान दिलाई. आज भी इसे भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में शामिल किया जाता है. 28 मई 1964 को महबूब खान ने 56 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया.
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