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वो एक्ट्रेस, जिनकी फिल्मों के साथ हुआ उनके फैन का अंत, 30 साल तक रोज 4 बजे देखने जाता फिल्म, मौत के बाद भी खाली रही सीट

भारतीय सिनेमा की 'ट्रैजेडी क्वीन' मीना कुमारी ने अपनी खूबसूरती, अदाकारी को पर्दे पर इस कदर बिखेरा कि इसने हजारों फैंस के दिल को छुआ. वहीं, एक प्रशंसक ऐसा भी था जिसकी दीवानगी का अंत उनकी फिल्मों के साथ ही हुआ.

वो एक्ट्रेस, जिनकी फिल्मों के साथ हुआ उनके फैन का अंत, 30 साल तक रोज 4 बजे देखने जाता फिल्म, मौत के बाद भी खाली रही सीट
मीना कुमारी 'ट्रेजेडी क्वीन' के नाम से थीं मशहूर

भारतीय सिनेमा की 'ट्रैजेडी क्वीन' मीना कुमारी ने अपनी खूबसूरती, अदाकारी को पर्दे पर इस कदर बिखेरा कि इसने हजारों फैंस के दिल को छुआ. प्यार और अपनेपन की तलाश में भटकती इस अदाकारा की कशिश का आलम ऐसा था कि हर कोई उनकी खूबसूरती का कायल था. वहीं, एक प्रशंसक ऐसा भी था जिसकी दीवानगी का अंत उनकी फिल्मों के साथ ही हुआ. हाल ही में पूजा भट्ट के पॉडकास्ट में मशहूर सिनेमेटोग्राफर हेमंत चतुर्वेदी ने मीना कुमारी के एक ऐसे फैन की अनोखी कहानी सुनाई, जिसकी सीट सिनेमाघर के आखिरी दिनों तक रिजर्व थी.

पूजा ने दोनों की बातचीत की ऑडियो क्लिप अपने इंस्टाग्राम पर शेयर की. इसमें हेमंत बताते हैं कि वह आदमी मीना कुमारी का इतना बड़ा फैन था कि सिर्फ मीना कुमारी की फिल्म देखने के लिए सिनेमाघर में उसकी सीट बुक रहती थी. हेमंत ने बताया, "जब मैं अपने करियर की शुरुआत में था, तो मध्य महाराष्ट्र के एक पुराने सिनेमाघर में काम के सिलसिले में गया था. वहां के मालिक ने मुझे एक बुजुर्ग दर्शक की कहानी सुनाई, जो मीना कुमारी के बेहद बड़े फैन थे."

मीना कुमारी का जबरा फैन 

सिनेमाघर के मालिक ने हेमंत को बताया था, "मेरे पिता मुझे बताया करते थे कि 1940 के दशक में बने इस थिएटर में एक बुजुर्ग सज्जन रोज शाम के चार बजे वाले शो में आते थे. वे मीना कुमारी की कोई भी फिल्म हो, उसी फिल्म को बार-बार देखते थे. चाहे फिल्म एक हफ्ते चले, दो हफ्ते चले, 21 हफ्ते या फिर 25 हफ्ते तक चले, वे हर रोज उसी सीट पर बैठकर पूरी फिल्म देखते थे. उनकी दीवानगी इतनी थी कि सिनेमाघर वाले उनके लिए हमेशा वह सीट पहले से रिजर्व रखते थे. यह सिलसिला करीब 25 से 30 साल तक लगातार चलता रहा. बुजुर्ग सज्जन मीना कुमारी की हर नई रिलीज फिल्म को उसी उत्साह से देखने आते थे."

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उन्होंने बताया, "जब मीना कुमारी की आखिरी फिल्में रिलीज हो रही थीं, तब भी सिनेमाघर वालों ने उनके लिए वही सीट रिजर्व रखी लेकिन उस दिन शाम चार बजे वे नहीं आए. अगले दिन भी उनका इंतजार किया गया, फिर भी वे नहीं पहुंचे. चिंता होने पर सिनेमाघर से किसी व्यक्ति को उनके घर भेजा गया. वहां जाकर पता चला कि बुजुर्ग सज्जन का देहांत हो चुका है."

किसी और को नहीं दी गई सीट 

उन्होंने आगे बताया कि इसके बाद से सिनेमाघर वालों ने फैसला किया कि उस सीट को कभी किसी और को नहीं देंगे. जब तक थिएटर बंद नहीं हुआ, उस बी-14 नंबर की सीट को हमेशा रिजर्व रखा गया. यह सीट उनके सबसे पसंदीदा दर्शक के सम्मान और पुरानी यादों के प्रतीक के रूप में खाली रखी गई. यह कहानी सिर्फ एक कलाकार की नहीं बल्कि उस रूहानी जुड़ाव की है जिसने सिनेमाई पर्दे और असल जिंदगी की सीमा को मिटा दिया था.
 

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