हिंदी सिनेमा में कुछ गाने ऐसे हैं जो समय की सीमाओं से परे जाकर हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं. ऐसा ही एक गीत है ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन', जो साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म ‘मौसम' का हिस्सा है. संजीव कुमार और शर्मिला टैगोर पर फिल्माया गया यह गीत आज भी सुकून, तन्हाई और बीते खूबसूरत पलों की याद दिलाने वाले सबसे बेहतरीन गानों में गिना जाता है. रिलीज के पांच दशक बाद भी इसकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है. आज भी लोग इस गाने को उसी चाव से सुनते हैं.
गुलजार की कलम से निकला है गीत
इस गीत को मशहूर गीतकार गुलजार ने लिखा था, जबकि इसका संगीत महान संगीतकार मदन मोहन ने तैयार किया. खास बात यह है कि फिल्म में इस गीत के दो अलग-अलग वर्जन सुनाई देते हैं. एक सोलो वर्जन, जिसे भूपिंदर सिंह ने अपनी गहरी और सुकून देने वाली आवाज में गाया, जबकि दूसरा डुएट वर्जन लता मंगेशकर और भूपिंदर सिंह की आवाज में रिकॉर्ड किया गया. दोनों ही वर्जन फैंस के बीच आज भी बेहद लोकप्रिय हैं.
फिल्म ‘मौसम' का निर्देशन गुलजार ने किया था और इसकी कहानी इंसानी रिश्तों, पछतावे और बीते वक्त की यादों के इर्द-गिर्द घूमती है. ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन' इस कहानी की भावनाओं को बेहद खूबसूरती से सामने लाता है. गीत के बोल उस जीवन की तलाश को बयां करते हैं, जहां भागदौड़ नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में सुकून, पहाड़ों की वादियां, ठंडी हवाएं और अपनों के साथ बिताए गए फुर्सत के पल हों.
संजीव कुमार और शर्मिला टैगोर की है फिल्म
मदन मोहन का मधुर संगीत, गुलजार की शायरी और लता मंगेशकर व भूपिंदर सिंह की दिल को छू लेने वाली आवाज ने इस गीत को सदाबहार बना दिया. यही वजह है कि आज भी जब कोई पहाड़ों की यात्रा पर जाता है या पुराने दिनों को याद करता है, तो यह गीत अनायास ही होंठों पर आ जाता है. ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन' सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं, बल्कि सुकून, यादों और जिंदगी की धीमी रफ्तार को महसूस कराने वाला एक ऐसा एहसास है, जो हर दौर के ऑडियंस के दिल में हमेशा जिंदा रहेगा.
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