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फिल्मों में कैसे शूट किए जाते हैं गाने? पढ़ें हिंदी सिनेमा के पहले स्लो मोशन गाने के बारे में

अगर यह सवाल पूछा जाए कि हिंदी सिनेमा का सबसे पहला स्लो-मोशन गाना कौन सा है, तो ज्यादातर लोग आमिर खान की फिल्म 'जो जीता वही सिकंदर' का गाना 'पहला नशा' का नाम लेंगे.

फिल्मों में कैसे शूट किए जाते हैं गाने? पढ़ें हिंदी सिनेमा के पहले स्लो मोशन गाने के बारे में
फिल्मों में कैसे शूट किए जाते हैं गाने?
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हिंदी फिल्मों में स्लो मोशन का इस्तेमाल आपने बहुत बार देखा होगा, कभी किसी रोमांचक फाइट सीक्वेंस में, तो कभी हीरोइज्म से भरपूर दृश्यों में, यहां तक कि गानों में भी. लेकिन गानों में अक्सर जब हीरो या हीरोइन गाना गा रहे होते हैं, तब उनके क्लोज-अप्स यानी कैमरे को उनके चेहरे के नजदीक लाने से बचा जाता है, और इसके पीछे एक तकनीकी वजह होती है. अगर यह सवाल पूछा जाए कि हिंदी सिनेमा का सबसे पहला स्लो-मोशन गाना कौन सा है, तो ज्यादातर लोग आमिर खान की फिल्म 'जो जीता वही सिकंदर' का गाना 'पहला नशा' का नाम लेंगे. लेकिन यह जवाब तकनीकी रूप से गलत है, क्योंकि आमिर खान से बहुत पहले इस तकनीकी चुनौती को स्वीकार कर चुके थे अपने दौर के दिग्गज कॉमेडियन और अभिनेता महमूद. 

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हिंदी सिनेमा का पहला स्लो-मोशन सॉन्ग

1971 में रिलीज हुई फिल्म 'लाखों में एक' का गाना ‘जोगी ओ जोगी' हिंदी सिनेमा का वह पहला गाना बना, जिसे पूरी तरह स्लो-मोशन में फिल्माया गया था. इस गाने में पर्दे पर महमूद के साथ राधा सलूजा नजर आई थीं, जबकि फिल्म की बाकी स्टार कास्ट में प्राण और अरुणा ईरानी जैसे नाम शामिल थे. इस फिल्म के निर्देशक एस.एस. बालन थे. इस गाने की एक और खास बात यह थी कि इसमें दोनों कलाकारों को नॉर्मल स्पीड में शूट किया गया था, पर जहां गाने के बोल आते थे, वहां निर्देशक ने इन दोनों कलाकारों के क्लोज-अप्स से बचने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि उन्हें कैमरे के बिल्कुल करीब फिल्माया.

क्या थी तकनीकी चुनौती?

आम जनता इस तरह के गानों को भले ही 'स्लो-मोशन सॉन्ग' बोलती है, लेकिन जब इसे कैमरे पर उतारा जाता है, तो प्रक्रिया बिल्कुल उल्टी होती है. सामान्य तौर पर जिन कैमरों से फिल्में शूट होती थीं, उनका रिकॉर्डिंग फ्रेम रेट 24 फ्रेम्स प्रति सेकंड होता है. वीडियो को स्लो-मोशन में ढालने के लिए इस फ्रेम रेट को बढ़ाकर 48, 72, 96 या फिर 120 फ्रेम्स प्रति सेकंड कर दिया जाता है, जिससे परदे पर किरदारों की गति धीमी दिखने लगती है.

असली चुनौती यह थी कि अगर कैमरा 48 या उससे ज्यादा फ्रेम्स प्रति सेकंड की रफ्तार से रिकॉर्ड कर रहा है, तो कलाकारों के होंठों का हिलना (Lip-sync) और उस गाने की ऑडियो को कैसे मैच किया जाए? कलाकारों को जिस गाने पर अपने होंठ हिलाने होते हैं, उसे सेट पर बजाया जाता है. इस तकनीकी बाधा से निपटने के लिए ऑडियो की स्पीड को भी कई गुना तेज कर दिया जाता था. इसी तेज रफ्तार ट्रैक पर कलाकार बहुत तेजी से अपने होंठ हिलाते थे. इसके बाद एडिटिंग टेबल पर ऑडियो और कलाकारों के उन तेज हिलते होंठों को स्लो-मोशन फुटेज के साथ सटीक बैठाया जाता था.

किशोर कुमार और लता मंगेशकर की जादुई आवाज

ठीक इसी तरह, फिल्म 'लाखों में एक' के गाने ‘जोगी ओ जोगी' की शूटिंग के दौरान भी इस प्रक्रिया को अपनाया गया. इस गाने को सामान्य गति से काफी ज्यादा स्पीड में बजाया गया और पर्दे पर दिख रहे कलाकारों, महमूद और राधा सलूजा ने उस तेज रफ्तार ट्रैक के मुताबिक अपने होंठ हिलाए. किशोर कुमार और लता मंगेशकर की जादुई आवाज से सजा यह एक ड्रीम सीक्वेंस था, जिसने हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहले स्लो-मोशन गाने के रूप में अपना नाम दर्ज कराया.

जाहिर है, आमिर खान ने बहुत बाद में 'पहला नशा' में इस तकनीक को दोहराया और यह गाना हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गया. वह एक विशुद्ध रोमांटिक गाना था, और उस परवान चढ़ते रोमांस के जादू को परदे पर उतारने के लिए ही उसे स्लो-मोशन में फिल्माया गया था.

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