हिंदी सिनेमा में कई ऐसी फिल्में हैं जो मसालेदार एंटरटेनमेंट से अलग अपनी अनोखी कहानी और प्रेजेंटेशन के लिए याद की जाती हैं. 1992 में रिलीज हुई एक ऐसी ही फिल्म ने दर्शकों को प्रेम, समाज और इंसानी रिश्तों को देखने का बिल्कुल अलग नजरिया दिया. खास बात ये है कि इसकी कहानी 1952 में लिखे गए एक चर्चित हिंदी उपन्यास पर बेस्ड थी. फिल्म में एक ऐसा कथावाचक है जो अपने दोस्तों को तीन महिलाओं की कहानियां सुनाता है और इन कहानियों के जरिए प्यार, उम्मीद, कास्टिज्म और समाज की परतें खुलती चली जाती हैं. रिलीज के बाद इस फिल्म को क्रिटिक्स ने खूब सराहा और इसे नेशनल लेवल पर भी बड़ा सम्मान मिला.
उपन्यास से पर्दे तक का दिलचस्प सफर
हम बात कर रहे हैं श्याम बेनेगल की फिल्म सूरज का सातवां घोड़ा की. ये फिल्म प्रसिद्ध साहित्यकार धर्मवीर भारती के इसी नाम के उपन्यास पर बेस्ड है. धर्मवीर भारती का ये उपन्यास 1952 में प्रकाशित हुआ था और हिंदी साहित्य में इसका खास स्थान है. श्याम बेनेगल ने उपन्यास की कॉम्पलेक्सिटी और मेटाफर्स को बेहद खूबसूरती से फिल्म में पेश किया. यही वजह रही कि फिल्म को 1993 में बेस्ट हिंदी फीचर फिल्म का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला. फिल्म में रजित कपूर, राजेश्वरी सचदेव, पल्लवी जोशी, नीना गुप्ता, अमरीश पुरी और रघुवीर यादव जैसे कलाकार नजर आए.
सूरज का सातवां घोड़ा में रजित कपूर कैसे बने मानेक मुल्ला
फिल्म मानेक मुल्ला का किरदार निभाने वाला रजित कपूर ने एनडीटीवी से बातचीत में बताया था कि उन्हें यह रोल कैसे मिला. उन्होंने बताया कि 'श्याम बाबू ने मेरा एक नाटक देखा था लव लेटर्स और उसके बाद वो मुझसे मिलने आए थे. मुझसे हाथ मिलाया और कहा मैं तुम्हें कांटेक्ट करूंगा कल और अचानक उनका फोन भी आ गया अगले दिन. कहा मुझसे आके मिलो. कुछ कहा नहीं उन्होंने बस एक सवाल पूछा कि हिंदी बोल लेते हो. मैंने कहा आप आजमा के देख लीजिए. तो उन्होंने मुझे स्क्रिप्ट दी और कहा ये फिल्म का प्रोजेक्ट है और मानेक मुल्ला ये कैरेक्टर है तो इसे पढ़ के मुझे बताओ तुम करना चाहोगे.'
उन्होंने आगे बताया, 'रात को जब मैं घर गया और मैंने पढ़ा मैंने कहा ओ माय गॉड ये तो लीड रोल है. मैंने तो सोचा भी नहीं था कि ऐसे निर्देशक मुझे अपना लीड रोल करने के लिए बुलाएंगे क्योंकि उससे पहले हम जब प्रोड्यूसर डायरेक्टर के ऑफिस जाते थे तो श्याम बाबू से मिलने की कोशिश की थी तो नहीं मिल पाए और यहां यही बंदा मुझे फोन करके स्क्रीन प्ले दे रहा है. मैं खुश हुआ. डरा भी हुआ था कि क्या मैं ये कर पाऊंगा. फिर मैंने धर्मवीर भारती का उपन्यास पढ़ा. मैंने कहा अरे ये नवेल तो कमाल की है, 100 पेज की नॉवेल है. मैंने कहा ये हम इससे क्यों हाथ लगा रहे हैं? ये इतनी खूबसूरत है. इसको रहने दो. हम फिल्म क्यों बना रहे हैं ये? तो मैंने केके भैया (केके रैना) हैं वो मेरे भाई का रोल उन्होंने किया था. मैंने उनको फोन किया. मैंने कहा कि केके भैया ये नॉवेल कहीं खराब ना हो जाए. क्यों बना रहे हैं? उन्होंने कहा तुम चुप रहो. तुम अपना काम करो. तुम्हें मौका मिल रहा है. तुम क्यों बोल रहे हो?'
राजित कपूर ने आगे बताया, 'और बाद में जब मैंने पहली स्क्रीनिंग जो नेहरू सेंटर पे रखी थी मैंने उसको देखी तो मैंने कहा अरे ये तो कमाल हो गया है. धर्मवीर साहब भी वहीं थे और मैंने श्याम बाबू से कहा माफ करना, लेकिन मुझे लगा था ये फिल्म उपन्यास को जरा भी छुएगी नहीं. लेकिन आपने तो वाकई उसे पर्दे पर चार चांद लगा दिए और धर्मवीर भारती जी भी इतने खुश थे क्योंकि शायद उनको भी एहसास नहीं था कि ये किस तरह रूप धारण करेगी उस उस पर्दे पर सिनेमा पर.'
मानेक मुल्ला और तीन महिलाओं की कहानी
फिल्म का फोकस मानेक मुल्ला नाम का किरदार पर है. जो अपने दोस्तों को तीन महिलाओं से जुड़ी कहानियां सुनाता है. ये महिलाएं हैं जमुना, लिली और सत्ती. दिलचस्प बात ये है कि ये सिर्फ तीन अलग-अलग प्रेम कहानियां नहीं हैं, बल्कि समाज के तीन अलग-अलग वर्गों से बिलॉन्ग करती हैं. जमुना मिडिल क्लास दुनिया की झलक दिखाती है, लिली एजुकेटेड वर्ग का प्रतीक है, जबकि सत्ती समाज के गरीब तबके की कहानी सामने लाती है. मानेक मुल्ला की नजर से सुनाई गई ये कहानियां प्रेम के पारंपरिक नजरिए को चुनौती देती हैं और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती हैं.फिल्म की सबसे खास बात इसका अनोखा कहानी कहने का तरीका है. पूरी कहानी यादों, किस्सों और अलग-अलग नजरिए से आगे बढ़ती है.
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