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Gandhi Talks Review: पैसे की तंगी और भ्रष्टाचार, क्या डगमगाए का ईमान? जानें कैसी है गांधी टॉक्स

फिल्म की कहानी मुंबई की एक चॉल में बसती है, जहां महादेव अपनी बीमार मां के साथ रहता है. उसके ठीक सामने अदिति राव हैदरी का किरदार अपने माता-पिता के साथ रहता है और दोनों का प्यार इशारों में परवान चढ़ता है.

Gandhi Talks Review: पैसे की तंगी और भ्रष्टाचार, क्या डगमगाए का ईमान? जानें कैसी है गांधी टॉक्स
Gandhi Talks Review: पैसे की तंगी और भ्रष्टाचार, क्या डगमगाए का ईमान?

कलाकार

विजय सेतुपति, अरविंद स्वामी, अदिति राव हैदरी, सिद्धार्थ जाधव, महेश मांजरेकर, उषा नाडकर्णी, जरीन वहाब

निर्देशक

किशोर पांडुरंग बेलेकर

संगीत

ए. आर. रहमान


कहानी

फिल्म की कहानी मुंबई की एक चॉल में बसती है, जहां महादेव अपनी बीमार मां के साथ रहता है. उसके ठीक सामने अदिति राव हैदरी का किरदार अपने माता-पिता के साथ रहता है और दोनों का प्यार इशारों में परवान चढ़ता है. महादेव की जिंदगी हर एक पैसे के लिए संघर्ष से भरी है, वहीं दूसरी ओर बोस मैन कंपनी का मालिक बोस (अरविंद स्वामी) है, जिसका कारोबार उसकी एक इमारत में लगी आग के कारण खत्म होने की कगार पर है. उस पर कोर्ट केस चल रहे हैं, उसका घर नीलामी की कगार पर है और एक विमान दुर्घटना में उसका पूरा परिवार खत्म हो चुका है, जिससे वह पूरी तरह टूट चुका है. फिर किस तरह इन दोनों किरदारों की जिंदगियां एक-दूसरे से टकराती हैं? पैसे की तंगी और भ्रष्टाचार क्या इनके ईमान को डगमगा पाएगा? यही इस फिल्म की कहानी है. आपने कहावत सुनी होगी, “पैसा बोलता है”, और इसी कहावत को थोड़ा मोड़ देकर फिल्म का नाम रखा गया है ‘गांधी टॉक्स'.


खास बात

मूक सिनेमा से लेकर अब तक भारतीय सिनेमा 100 साल का सफर तय कर चुका है. शुरुआत में मूक फिल्में तकनीकी मजबूरी थीं, क्योंकि बोलती फिल्मों की तकनीक बाद में आई. लेकिन आज के दौर में, जहां तेज संगीत, भव्य सिनेमा और व्यावसायिक फिल्मों का दबदबा है, और किसी भी फिल्म की कहानी से पहले उसकी बाजार में बिकने की संभावना पर विचार किया जाता है, ऐसे समय में मूक फिल्म बनाना निर्देशक और निर्माताओं की हिम्मत और सिनेमा के प्रति समर्पण को दर्शाता है.

15 साल बाद इस फिल्म को पर्दे पर उतरता देखकर निर्देशक किशोर पांडुरंग भावुक भी हैं और खुश भी. साथ ही ए. आर. रहमान, विजय सेतुपति और अदिति राव हैदरी की भी तारीफ करनी होगी, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट पर भरोसा किया और इसे करने के लिए तैयार हुए.

खामियां

विजय सेतुपति के किरदार का संघर्ष शुरुआत में ही स्पष्ट हो जाता है, लेकिन एक समय के बाद यह संघर्ष दोहराव भरा लगने लगता है और कहानी कुछ जगह ठहर जाती है.

मध्यांतर के बाद घर से जुड़ा एक दृश्य लंबा खिंच जाता है.

कुछ किरदार पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाते, जैसे पत्रकार का किरदार—दर्शक अनुमान लगाता रह जाता है कि वह कौन है और उसकी भूमिका क्या है.

निर्देशक-लेखक ने बहुत चतुराई से पटकथा लिखी है, जिससे कई जगह सवाल उठाना मुश्किल हो जाता है कि किरदार बोल क्यों नहीं रहा. कई परिस्थितियां ऐसी हैं जहां चुप रहना स्वाभाविक लगता है जैसे बीमार मां सो रही हो या घर में कोई चोरी से घुस आया हो. लेकिन कुछ जगह ऐसा लगता है कि जहां बहुत शोर है, वहां भी किरदार इशारों में ही क्यों बात कर रहा है या फिर दृश्य को सुविधा के अनुसार काट दिया गया है जैसे अदालत के दृश्य में जज जब बोलने के लिए माइक अपनी ओर करता है, वहीं दृश्य खत्म हो जाता है, या बाजार में जब महादेव हथियार खरीदने जाता है.

खूबियां

किशोर का निर्देशन बिना संवाद के मुंबई की चॉल की जिंदगी को बेहद खूबसूरती से पेश करता है—कभी रेडियो पर बजते गानों के जरिए, कभी वहां बैठे लोगों के जरिए, तो कभी रोजमर्रा के रूटीन के जरिए. शुरुआती ही दृश्य में बिना कट का एक लंबा शॉट दर्शक को फिल्म की दुनिया में खींच लेता है. यहां छायाकार और कलाकारों की भी तारीफ करनी होगी, क्योंकि ऐसे शॉट आसान नहीं होते.

यह फिल्म जितनी अभिनय और हाव-भाव के जरिए बोलती है, उतनी ही प्रतीकों और संकेतों के जरिए भी संवाद करती है.

विजय सेतुपति एक कद्दावर अभिनेता हैं और उन्होंने कई फिल्मों में यह साबित किया है. यह फिल्म उनके लिए चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन उन्होंने इस किरदार को बेहद खूबसूरती से जीवंत किया है. अरविंद स्वामी और अदिति राव हैदरी ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. सहज अभिनय, बिना किसी लाउडनेस के भाव और दर्द दोनों दर्शकों तक आसानी से पहुंच जाते हैं.

संगीतकार ए. आर. रहमान के लिए भी यह चुनौतीपूर्ण काम था, क्योंकि यहां गीतों को संगीत नहीं देना था, बल्कि संगीत को बोलना था दर्शकों से संवाद करना था और भावनाओं को मजबूती देनी थी. रहमान ने यह काम बेहद खूबसूरती से किया है.

सिद्धार्थ जाधव हास्य के दृश्य देने में पूरी तरह सफल रहे हैं. बिना बोले हास्य चार्ली चैपलिन से लेकर मिस्टर बीन तक ने किया है, और यहां विजय और सिद्धार्थ के बीच के दृश्य दर्शकों को खूब गुदगुदाते हैं—उन्हें पूरे अंक.

निर्देशन की तारीफ पहले भी हो चुकी है, लेकिन उससे भी ज्यादा खास बात यह है कि एक व्यक्ति ने 15 साल तक अपने दृढ़ विश्वास पर काम किया, कलाकारों से लेकर निर्माताओं और स्टूडियो को एक मूक फिल्म के लिए तैयार किया, और आखिरकार फिल्म बनाकर रिलीज भी कराई. बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के दौर में जितना विश्वास इन लोगों ने दिखाया है, उतना ही प्यार दर्शकों को भी इस फिल्म के लिए दिखाना चाहिए. क्योंकि भले ही यह सिनेमा चुप है, लेकिन आज की मसाला फिल्मों से कहीं ज्यादा गहरी बात कह जाता है.

फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जिन पर विस्तार से बात की जा सकती है, लेकिन इससे कहानी खुल जाएगी. बेहतर होगा कि आप खुद जाएं और देखें, और उन निर्माताओं व निर्देशकों का हौसला बढ़ाएं जो सार्थक सिनेमा बनाना चाहते हैं.

रेटिंग: 3.5 स्टार

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