हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे हैं, जो दशकों बाद भी अपनी चमक नहीं खोते. फिल्म गाइड (1965) का मशहूर गीत 'दिन ढल जाए हाय रात ना जाए' भी उन्हीं गीतों में शामिल है. मोहम्मद रफी की दर्दभरी आवाज में रिकॉर्ड हुआ यह गाना आज भी संगीत प्रेमियों की पहली पसंद माना जाता है. इस गीत को लेकर वर्षों से कई दिलचस्प किस्से सुनाए जाते रहे हैं. कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग से पहले धुन और बोल को लेकर एसडी बर्मन और लेखर के बीच इतनी तीखी बहस हुई कि माहौल तनावपूर्ण हो गया था. बात गली गलौज तक पहुंच गई थी. हालांकि जब रफी साहब ने माइक संभाला तो उनकी आवाज़ के सामने सारे विवाद फीके पड़ गए और यह गीत हमेशा के लिए अमर हो गया.
पहले रिकॉर्ड हुआ था दूसरा गाना
फिल्म गाइड के लिए शुरुआत में 'दिन ढल जाए' की जगह एक दूसरा गीत रिकॉर्ड किया गया था. रिपोर्ट्स के मुताबिक, रफी साहब ने 'हम ही में थी न कोई बात…' गीत भी रिकॉर्ड किया था. लेकिन बाद में संगीतकार एस.डी. बर्मन को लगा कि फिल्म के उस खास दृश्य पर 'दिन ढल जाए' ज्यादा प्रभावशाली साबित होगा. इसके बाद गाने को बदला गया और नया गीत रिकॉर्ड किया गया. यह फैसला फिल्म और संगीत दोनों के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ. आज 'दिन ढल जाए' को हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन दर्दभरे गीतों में गिना जाता है.
रफी साहब की आवाज ने बना दिया सदाबहार
'दिन ढल जाए' में मोहम्मद रफी ने जिस भाव और दर्द के साथ अपनी आवाज दी, उसने इस गीत को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया. देव आनंद पर फिल्माए गए इस गीत में बिछड़ने का दर्द और प्रेम की तड़प साफ महसूस होती है. यही वजह है कि रिलीज के छह दशक बाद भी यह गाना उतना ही लोकप्रिय है. गाइड के संगीत को एस.डी. बर्मन के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है और 'दिन ढल जाए' उसकी सबसे चमकदार कड़ी माना जाता है. आज भी यह गीत रेडियो, म्यूजिक प्लेटफॉर्म्स और स्टेज शो में बराबर सुना जाता है और हर पीढ़ी के श्रोताओं के दिलों को छू जाता है.
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