मिडिल ईस्ट जंग का एक महीना: खामेनेई की मौत, खाड़ी देशों पर हमले और होर्मुज बंदी से दुनियाभर में मचा हाहाकार

28 फरवरी को शुरू हुए ईरान-इजरायल-अमेरिका के युद्ध को एक महीना पूरा हो चुका है. जंग की शुरुआत अमेरिका और इजरायल के उस अचानक हवाई हमले से हुई, जिसमें ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया. जानें इस एक महीने में क्या-क्या बदल गया...

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नई दिल्ली:

मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध को एक महीना पूरा हो चुका है. 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ यह संघर्ष अब एक सीमित सैन्य टकराव से निकलकर क्षेत्रीय संकट का रूप लेता दिख रहा है. बीते 30 दिनों में रणनीति, लक्ष्य और असर तीनों स्तर पर इस जंग का स्वरूप बदल गया है.

शुरुआती हमला और टर्निंग पॉइंट

जंग की शुरुआत अमेरिका और इजरायल के उस अचानक हवाई हमले से हुई, जिसमें ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया. इसी हमले में अली खामेनेई की मौत की खबर ने पूरे क्षेत्र में भूचाल ला दिया. यही घटना इस संघर्ष का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी, जिसके बाद ईरान ने सीधे और आक्रामक जवाबी कार्रवाई का रास्ता अपनाया.

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ईरान की बदली रणनीति: प्रॉक्सी से डायरेक्ट अटैक तक

पहले ईरान अप्रत्यक्ष रूप से अपने सहयोगी गुटों के जरिए जवाब देता रहा, लेकिन एक महीने के भीतर उसकी रणनीति पूरी तरह बदल गई. अब ईरान सीधे अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है. सऊदी अरब में स्थित प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर हमला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां 10 अमेरिकी सैनिक घायल हुए. लगातार दो बार इस बेस को निशाना बनाना इस बात का संकेत है कि ईरान अब युद्ध को अमेरिकी मोर्चे तक खींच चुका है.

इजरायल पर दबाव और शहरी हमले

ईरान ने जवाबी रणनीति के तहत तेल अवीव और हाइफा जैसे प्रमुख शहरों को मिसाइल हमलों से निशाना बनाया. इससे साफ है कि जंग अब केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शहरी क्षेत्रों तक फैल चुकी है. इजरायल की एयर डिफेंस सिस्टम ने कई हमलों को रोका, लेकिन खतरा लगातार बना हुआ है और आम नागरिकों में असुरक्षा का माहौल गहराया है.

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अमेरिका को सैन्य और आर्थिक झटका

इस एक महीने में अमेरिका को भी भारी नुकसान झेलना पड़ा है. सैकड़ों सैनिक घायल हुए, कई हाई-टेक ड्रोन और एयरक्राफ्ट नष्ट हुए और अरबों डॉलर के सैन्य उपकरण क्षतिग्रस्त हुए. कुवैत में अपने ही एयर डिफेंस द्वारा F-15E विमान गिराया जाना और इराक में हादसे में सैनिकों की मौत इस युद्ध की जटिलता को दिखाते हैं. इसके बावजूद अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने के संकेत दिए हैं और अतिरिक्त एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती की तैयारी कर रहा है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में तो अमेरिका के F35 को भी गिराने का दावा किया गया. हालांकि अमेरिका ने इन रिपोर्ट्स को खारिज किया. 

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न्यूक्लियर ठिकानों पर खतरा और वैश्विक चिंता

ईरान के बुशहर न्यूक्लियर पावर प्लांट पर हमला इस जंग को और संवेदनशील बना देता है. हालांकि किसी बड़े नुकसान की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने इसे बेहद खतरनाक संकेत माना है. अगर न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर इस जंग की चपेट में आता है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा.

वैश्विक राजनीति और कूटनीतिक गतिरोध

इस युद्ध ने दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया है. एक तरफ अमेरिका के साथ पश्चिमी और कुछ अरब देश खड़े हैं, जबकि दूसरी ओर रूस और चीन जैसे देश ईरान के समर्थन में नजर आ रहे हैं. एस. जयशंकर ने साफ किया है कि भारत शांति और कूटनीति का पक्षधर है.

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ऊर्जा संकट और वैश्विक असर

जंग का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम व्यापारिक मार्ग पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो दुनिया को बड़े आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है.

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और खतरनाक दौर की ओर?

एक महीने बाद यह साफ हो चुका है कि यह जंग अब सीमित नहीं रही. ईरान की आक्रामक रणनीति, अमेरिका की बढ़ती सैन्य तैयारी और लगातार फैलता दायरा संकेत दे रहे हैं कि आने वाले हफ्तों में हालात और गंभीर हो सकते हैं. डोनाल्ड ट्रंप के बातचीत वाले बयान और जमीनी हमलों की तीव्रता के बीच का अंतर यही दिखाता है कि शांति अभी दूर है.

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