- ट्रंप ईरान के खिलाफ युद्ध खत्म करने की योजना पर काम कर रहे हैं. चाहे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह न खुले.
- ट्रंप प्रशासन ने जलडमरूमध्य को खोलने के लिए सैन्य अभियान की समयसीमा 6 हफ्तों से न बढ़ाने का फैसला लिया.
- अमेरिका ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए कूटनीतिक दबाव बढ़ाएगा.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान को खत्म करने के लिए तैयार हैं. भले ही रणनीतिक रूप से बेहद अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह न खुले. वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की सोमवार को छपी रिपोर्ट में प्रशासनिक अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी गई है.
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप और उनकी टीम इस नतीजे पर पहुंची है कि जलडमरूमध्य को तुरंत खोलने के लिए कोई बड़ा सैन्य अभियान चलाया गया तो संघर्ष उनकी तय समयसीमा 4 से 6 हफ्तों से ज्यादा खिंच सकता है. ऐसे में प्रशासन फिलहाल सीमित सैन्य लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने की रणनीति अपना रहा है.
कूटनीति का रास्ता अपनाएगा अमेरिका
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका का फोकस ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करने पर रहेगा, जबकि कूटनीतिक दबाव के जरिए तेहरान को होर्मुज के रास्ते मुक्त व्यापार बहाल करने के लिए राजी करने की कोशिश की जाएगी.
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यूरोप और खाड़ी देशों के सहारे अमेरिका
अगर कूटनीतिक प्रयास विफल रहते हैं, तो अमेरिका अपने यूरोपीय और खाड़ी सहयोगियों से आग्रह करेगा कि वे जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की अगुवाई करें. रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप के पास अभी भी सैन्य विकल्प मौजूद हैं, लेकिन वे फिलहाल उनकी प्राथमिकता नहीं हैं.
इस बीच व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलिन लेविट ने सोमवार को कहा कि अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य परिचालन बहाल करने की दिशा में काम कर रहा है.
US-इजरायल ने शुरू की जंग
गौरतलब है कि क्षेत्र में तनाव उस समय और बढ़ गया था जब 28 फरवरी को इज़रायल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया. रिपोर्टों के अनुसार, अब तक इस संघर्ष में 2000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. इजरायल और यूएस की इस स्ट्राइक में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की भी मौत हो गई, जिसके बाद यह युद्ध हिंसक हो गया.
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जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों को बनाया निशाना
इसके जवाब में ईरान ने ड्रोन और मिसाइल हमलों के जरिए इजरायल, जॉर्डन, इराक और उन खाड़ी देशों को निशाना बनाया है, जहाx अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इन हमलों से जान-माल का नुकसान हुआ है, बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है और वैश्विक बाजारों व विमानन सेवाओं पर भी असर पड़ा है.













