आज हमारे पास मनोरंजन के ढेरों साधन मौजूद हैं. यूट्यूब से लेकर ओटीटी प्लेटफार्म्स तक, सब हमारे पास एक क्लिक पर उपलब्ध हो जाते हैं. चाहे गाने सुनना हो या फिल्म देखनी हो या फिर वेब सीरीज सब कुछ मोबाइल के अलग-अलग ऐप पर मिल जाता है. टीवी भी आज स्मार्ट हो गया है और डिजिटल प्लेटफार्म्स से जुड़ चुका है. लेकिन अब से 4 दशक पहले हालात ऐसे नहीं थे. मनोरंजन के साधन बेहद दुर्लभ हुआ करते थे. आपको जानकर हैरानी होगी कि तब टीवी देखने या रेडियो सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था.
टीवी होना स्टेटस सिंबल
वह दौर ऐसा था जब टीवी होना एक स्टेटस सिंबल था. गांवों में तो शायद ही किसी के घर में टीवी होती, ये रईसों का शौक माना जाता था. शहरों में भी गिने-चुने लोगों के घर ही टीवी होती थी और जिसके घर टीवी होती वहां देखने वालों का हुजूम उमड़ जाता था. सब मिलकर टीवी देखते थे. उस घर को टीवी वाले घर के नाम से पहचान ही मिल जाती थी. लेकिन टीवी खरीदने से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता था उसे देखने के लिए लाइसेंस लेना.
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1980 के दशक में देश में मनोरंजन के दो ही साधन थे, एक रेडियो और दूसरा टीवी. लेकिन इन्हें भी पाना आसान नहीं था. इसके लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था. 1980 के दशक में साल भर का रेडियो-टीवी लाइसेंस बनाया जाता था और हर साल 100 रुपये खर्च करके उसे रिन्यू कराना होता था.
पोस्ट ऑफिस से मिलता था लाइसेंस
उस दौर में टीवी चलाने के लिए लाइसेंस की लेनी होती थी. लाइसेंस पोस्ट ऑफिस के जरिए जारी किया जाता था. एक बार लाइसेंस मिल गया तो हर साल उसे रिन्यू कराना जरूरी होता था, ताकि आगे भी टीवी देख सकें. रिन्यू कराने के लिए साल में एक बार 100 रुपये का पेमेंट देना होता था.
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