20 साल बाद सेना भवन में दाखिल हुए राज ठाकरे, कभी यहां उनकी बोलती थी तूती

ठाकरे बंधुओं की कहानी सिर्फ रिश्तों की नहीं, महाराष्ट्र की बदलती राजनीति की दास्तान है. जहां वारिस तय होता है, विरोध जन्म लेता है, प्रयोग होते हैं, ग्राफ गिरता है और अंततः अस्तित्व का सवाल उठा तो अब सुलह हो गई है. 20 साल बाद शिवसेना भवन में राज ठाकरे की वापसी, बीते संघर्षों पर पर्दा नहीं, बल्कि आने वाली राजनीति का नया अध्याय है.

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  • राज ठाकरे 20 साल बाद शिवसेना भवन में लौट रहे हैं, जहां उनका राजनीतिक सफर और विवाद दोनों शुरू हुए थे.
  • 2003 में उद्धव ठाकरे को शिवसेना का अध्यक्ष बनाया गया, जिससे राज और उद्धव के बीच दरार बढ़ी.
  • 2005-06 में राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) का गठन किया था.
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रविवार की दोपहर राज ठाकरे के लिए सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भावनाओं से भरी वापसी है. 20 साल बाद वे शिवसेना भवन में दाखिल हुए. वही इमारत, जहां से उनके राजनीतिक जीवन ने आकार लिया और जहां से 2005 में रिश्ता टूट गया था. अब चचेरे भाई उद्धव ठाकरे से सुलह और शिवसेना (यूबीटी) के साथ गठबंधन के बाद, दोनों दलों का संयुक्त घोषणापत्र यहीं से जारी होगा. यह महज गठबंधन नहीं, बल्कि दो दशकों की अदावत, उतार-चढ़ाव और बदलती राजनीति का पड़ाव है.

वारिस की घोषणा और दरार की शुरुआत (2003)

2003 में महाबलेश्वर अधिवेशन में बालासाहेब ठाकरे ने अपने तीसरे बेटे उद्धव ठाकरे को शिवसेना का कार्याध्यक्ष घोषित किया. यह फैसला कईयों के लिए चौंकाने वाला था, क्योंकि संगठन के भीतर और बाहर, राज ठाकरे को स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था. तर्क भी थे. राज की शक्ल-सूरत, आक्रामकता, भाषण शैली और कार्टूनिस्ट होने तक में बालासाहेब की छाया दिखती थी. लेकिन वारिस की घोषणा ने रिश्तों में पहली बड़ी दरार डाल दी.

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राज ठाकरे: व्यक्तित्व, प्रयोग और विरोधाभास

बालासाहेब के भाई श्रीकांत ठाकरे के बेटे राज (जिनका नाम कभी ‘स्वरराज' था) राजनीति में जल्दी सक्रिय हुए. बालासाहेब ने उन्हें भारतीय विद्यार्थी सेना का अध्यक्ष बनाया. 90 के दशक में रोजगार के मुद्दे पर शिव उद्योग सेना बनाई. फंड जुटाने के लिए माइकल जैक्सन को मुंबई बुलाने का फैसला- जहां शिवसेना पश्चिमी संस्कृति का विरोध करती रही. राज के ‘आउट ऑफ द बॉक्स' अंदाज का उदाहरण था.

किणी कांड: टर्निंग पॉइंट (1996)

राजनीतिक सफर का सबसे बड़ा झटका रमेश किणी कांड था. 23 जुलाई 1996 को पुणे में किणी की हत्या हुई. आरोपों की आंच राज ठाकरे तक पहुंची. सीबीआई जांच हुई, राज से पूछताछ हुई, उनके करीबी आशुतोष राणे गिरफ्तार हुए. राज जेल नहीं गए, पर पार्टी के भीतर उनका कद घटता गया. यहीं से उद्धव ठाकरे ने संगठन पर पकड़ मजबूत करनी शुरू की. टिकट बंटवारे और फैसलों में राज के समर्थक हाशिए पर चले गए.

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‘मी मुंबईकर' बनाम मराठीवाद की सख्ती (2003)

उद्धव ठाकरे ने ‘मी मुंबईकर' अभियान के जरिए सभी प्रांतों को जोड़ने की कोशिश की. वहीं, राज के समर्थकों ने कल्याण स्टेशन पर उत्तर भारत से आए परीक्षार्थियों पर हिंसा की. जहां उद्धव हिंदी ‘सामना', उत्तर भारतीय सम्मेलन और संजय निरूपम को राज्यसभा भेजकर पुल बना रहे थे, वहीं राज की राजनीति ने उस पुल को बार-बार तोड़ा.

शिवसेना से विदाई, एमएनएस का जन्म (2005–06)

2005 में राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ी. 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) बनी. मराठीवाद और परप्रांतीय विरोध के उसी एजेंडे के साथ, जिस पर बालासाहेब ने शिवसेना खड़ी की थी. 2009 से पहले उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा, भड़काऊ भाषण और गिरफ्तारी से एमएनएस चर्चा के केंद्र में आ गई.

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2009-2012: शिखर की ओर

2009 विधानसभा: 13 विधायक- संख्या कम, असर बड़ा 

दादर जैसे शिवसेना के गढ़ में एमएनएस की जीत से शिवसेना के अस्तित्व पर सवाल खड़े हुए.

नासिक 2012: एमएनएस सबसे बड़ी पार्टी, मेयर बना 

साल 2012 में नासिक में मनसे अपना मेयर बनाने में कामयाब रही. राज ठाकरे का दावा था कि वे राज्य की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं.

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नासिक मॉडल और गिरता ग्राफ

गोदावरी रिवरफ्रंट (गोदा पार्क) जैसे ड्रीम प्रोजेक्ट, शहरी बदलाव की कोशिशें हुईं पर समय के साथ न प्रोजेक्ट टिके, न सियासी रुतबा.

2014 विधानसभा: 1 सीट

2017 नगर निकाय: नासिक हाथ से गया

2019 विधानसभा: फिर 1 सीट

नेता साथ छोड़ते गए, ‘मौजी' शैली पर सवाल उठे.

मोदी: समर्थन से विरोध, फिर यू-टर्न

2011: गुजरात दौरा, मोदी मॉडल की तारीफ

2014: बीजेपी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारे

2019: मोदी पर तीखा हमला, वीडियो प्रोजेक्शन के साथ सभाएं फिर आया ईडी का समन.  22 अगस्त 2019 की ED ने राज ठाकरे से 9 घंटे की पूछताछ की. इसके बाद मोदी-विरोध थम गया. 

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2024 लोकसभा: मनसे का बीजेपी को बिना शर्त समर्थन

मराठीवाद से हिंदुत्व (2020 के बाद)

एमएनएस का झंडा बदला. चौरंगी से भगवा किया गया. इसके साथ ही एजेंडा भी बदला. पार्टी मराठीवाद से हिंदुत्व की ओर बढ़ी.  मस्जिदों के लाउडस्पीकर, हनुमान चालीसा से राजनीति की नई धुरी तय होने लगी.  हिंदीभाषी वागीश सारस्वत महासचिव बने. वही राज, जो कभी उत्तर भारत विरोध की पहचान थे अब हिंदीभाषी लोगों पर भरोसा करने लगे.

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2024-25: हार, अस्तित्व और सुलह

2024 विधानसभा में एमएनएस को शून्य सीटें. बेटे अमित ठाकरे की एंट्री, लेकिन वो भी हार गए. उद्धव ठाकरे भी 2022 की टूट और 2024 की कमजोर परफॉर्मेंस से जूझते रहे. बीएमसी चुनाव से पहले दोनों ने समझा कि अलग-अलग रहकर अस्तित्व बचाना मुश्किल है. फिर दोनों में अब सुलह हुई है. 

आज का दिन: 20 साल बाद वापसी

आज दोपहर 12 बजे शिवसेना भवन में संयुक्त घोषणापत्र जारी हुआ. इसमें राज और उद्धव ठाकरे दोनों रहेंगे. राज ठाकरे के लिए यह पल भावुक करने वाला भी है. क्योंकि जिस शिवसेना दफ्तर को 20 साल पहले राज ठाकरे आपसी मतभेद के चलते छोड़कर आए थे. आज फिर उसी शिवसेना भवन में राज ठाकरे वापस पहुंचे और निकाय चुनावों के लिए घोषणापत्र जारी करेंगे.

गठबंधन के मास्टर प्लान में घरेलू कामगार महिलाओं को ₹1500/माह, 700 स्क्वेयर फीट तक के घरों को प्रॉपर्टी टैक्स में छूट दी जा रही है. 

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