मध्य प्रदेश में दूषित पेयजल की आपूर्ति को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने कड़ा रुख अपनाया है. भोपाल स्थित एनजीटी की पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि दूषित पानी की आपूर्ति करना मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. पीठ ने गुरुवार को पारित एक अहम आदेश में इसे गंभीर पर्यावरणीय और जन-स्वास्थ्य आपात स्थिति करार दिया है. यह आदेश इंदौर निवासी राशिद नूर खान की दायर याचिका पर पारित किया.
अधिकरण ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के शहरी इलाकों में पेयजल आपूर्ति की भयावह स्थिति की ओर इशारा करते हैं. एनजीटी ने पाया कि कई शहरों में सप्लाई किए जा रहे पानी में फीकल कोलीफॉर्म, ई-कोलाई और विब्रियो जैसी रोगजनक बैक्टीरिया की मौजूदगी पाई गई है, जो सीधे तौर पर सीवेज के पेयजल में मिलने का संकेत देती है.
इंदौर के भागीरथपुरा की घटना का विशेष उल्लेख
एनजीटी ने अपने आदेश में इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र की उस घटना का विशेष तौर पर उल्लेख किया, जहां दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में अत्यधिक दूषित पानी की आपूर्ति के कारण जलजनित बीमारियों का बड़ा प्रकोप हुआ. इस दौरान बड़ीं संख्या में लोग अस्पतालों में भर्ती हुए. वहीं, 20 से ज्यादा लोगों की जान चली गई.
दूषित पानी पहुंचने के ये बड़ी लापरवाहियां
अधिकरण ने माना कि यह स्थिति जर्जर पाइपलाइनों, पेयजल और सीवेज लाइनों के खतरनाक ढंग से पास-पास बिछे होने, खराब रखरखाव और प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है. एनजीटी ने यह भी नोट किया कि पाइपलाइन बदलने के लिए वर्षों पहले टेंडर जारी हुए थे, लेकिन उन पर अमल नहीं हुआ.
समस्या सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं
एनजीटी ने कहा कि भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, रीवा, सतना, खरगोन जैसे कई शहरों में भी इसी तरह के जोखिम मौजूद हैं, जिससे यह मामला राज्य-व्यापी संकट बन जाता है. अधिकरण ने राष्ट्रीय आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि देश में हर साल करीब दो लाख मौतें दूषित पेयजल के कारण होती हैं.
पूरे राज्य के लिए एक जैसे सख्त निर्देश
याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार करते हुए एनजीटी ने मध्य प्रदेश सरकार और सभी नगर निगमों को राज्य-स्तरीय अनिवार्य दिशानिर्देश (State-wide SOPs) लागू करने का आदेश दिया.
- जर्जर पाइपलाइनों की मरम्मत और रिसाव रोकना.
- अनिवार्य क्लोरीनेशन और नियमित जल गुणवत्ता जांच.
- जल और सीवेज लाइनों को अलग-अलग और सुरक्षित करना.
- जल स्रोतों के आसपास अतिक्रमण हटाना.
- जल गुणवत्ता रिपोर्ट का सार्वजनिक प्रकटीकरण.
- नागरिक शिकायतों के लिए जल निगरानी मोबाइल ऐप विकसित करना.
मुआवजे और जिम्मेदारी के संकेत
एनजीटी ने ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत' और सख्त एवं पूर्ण दायित्व के आधार पर अंतरिम मुआवजे की मांग पर भी संज्ञान लिया. अधिकरण ने प्रथम दृष्टया माना कि संबंधित अधिकारियों ने प्रदूषण की जानकारी होने के बावजूद दूषित जल की आपूर्ति जारी रखी, जो कानून का उल्लंघन है.
संयुक्त समिति का गठन
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने विभिन्न विभागों और विशेषज्ञ संस्थानों की संयुक्त समिति गठित करने का आदेश दिया है. यह समिति प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करेगी और छह सप्ताह में रिपोर्ट सौंपेगी. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को समिति की नोडल एजेंसी बनाया गया है.
अधिकरण ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने को कहा है और मामले की अगली सुनवाई 30 मार्च को तय की है. साथ ही आदेश की प्रति राज्य के सभी जिला कलेक्टरों और नगर आयुक्तों को तत्काल कार्रवाई के लिए भेजने के निर्देश दिए गए हैं.














