मेरा नाम पुनीत है और मैं 35 साल की हो गई हूं. जबसे होश संभाला है, एक ऐसी दिक्कत से मैं जूझ रही थी जिसे फिक्स करना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था. अक्सर मेरा मजाक भी उड़ाया जाता था और सच कहूं तो मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती थी. मेरी इस एक गलती के चलते सारी महिलाओं को एक ही कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया जाता था कि लड़कियों को रास्तों की समझ नहीं होती. मैं वही लड़की थी जो गूगल मैप्स पर लेफ्ट सुनकर कॉन्फिडेंस के साथ राइट मुड़ जाती थी और फिर 5 किलोमीटर आगे जाकर पता चलता था कि रास्ता तो पीछे छूट गया.
घर आकर जब मैंने अपनी मां से ये बात साझा की तो पहले तो वो बहुत हंसी. हालांकि उनको हंसता देख फिर मैं भी थोड़ा हंस ली थी. लेकिन अंदर से मुझे बहुत खराब लग रहा था.

अंधेरे में मुझे और घबराहट होने लगी, अकेले में भी लग रहा था जैसे उसने जाने किस-किस को फोन पर ये बात कैसे-कैसे बताई होगी. क्या-क्या कहा होगा मेरे बारे में. मां ने देख लिया था कि मेरे कमरे की लाइट ऑन है. वह समझ गई और मेरे कमरे में आई.
मां ने कहा डरो नहीं, तुम अपनी इस आदत को सुधार सकती हो. तुम्हें बस खुद को 21 दिन देने होंगे. और हां हमेशा की तरह आलस नहीं, 21 मतलब इक्कीस. मैंने मां से कहा भी था -

मां ने बस इतना कहा. वो जो कर सकता है करने दो, तुम जो कर सकती हो करो.
बस फिर क्या था, मैंने मां के कहे अनुसार खुद को 21 दिन दिए. और पिछले 21 दिनों में मैंने अपनी इस कमजोरी को एक चैलेंज की तरह लिया. मैंने कुछ ऐसी आसान ट्रिक्स अपनायीं जिनसे मेरा रास्तों को देखने का नजरिया ही बदल गया. अगर आप भी मेरी तरह मैप्स और डायरेक्शन को लेकर कंफ्यूज रहती हैं तो मेरी ये कहानी और टिप्स आपके बहुत काम आयेंगे.
क्यों होता था मेरे साथ ऐसा
शुरुआत में मुझे लगता था कि शायद मेरा दिमाग ही ऐसा है. रिसर्च कहती है कि पुरुषों और महिलाओं के दिमाग में रास्तों को समझने का तरीका अलग होता है. पुरुष अक्सर दिशाओं जैसे उत्तर या दक्षिण के हिसाब से सोचते हैं जबकि हम महिलाएं लैंडमार्क्स यानी निशानों पर ज्यादा भरोसा करती हैं. मेरी दिक्कत यह थी कि मैं निशानों को याद तो रखती थी पर उनका कनेक्शन नहीं जोड़ पाती थी. जैसे ही कोई नया रास्ता आता मेरी धड़कनें तेज हो जातीं और मैं हड़बड़ी में गलत मोड़ ले लेती थी.

21 दिन का मेरा वो सफर | How I fixed my bad sense of direction in 21 days?
मैंने तय किया कि अब बहुत हुआ मजाक. अब मैं खुद ड्राइव करूंगी और बिना किसी की मदद के रास्तों को समझना सीखूंगी. इन तीन हफ्तों में मैंने जो सीखा वो किसी जादुई ट्रिक से कम नहीं है.
1. गूगल मैप्स को अपना दोस्त बनाया मालिक नहीं : पहले मैं आंख बंद करके मैप्स की आवाज सुनती थी. अब मैंने मैप को नॉर्थ अप मोड पर सेट कर दिया. इससे मैप बार बार गोल नहीं घूमता. मैंने मैप को बड़ा करके पहले ही देख लिया कि मुझे अगले दो मोड़ कहां लेने हैं. जब आप पहले से मेंटली तैयार होती हैं तो गलती की गुंजाइश कम हो जाती है.
2. अपने शरीर को बनाया कंपास : लेफ्ट और राइट का कन्फ्यूजन मिटाने के लिए मैंने एक बहुत पुरानी ट्रिक अपनायी. मैंने अपने बाएं हाथ की कलाई पर एक काला धागा बांध लिया. जब भी मैप कहता लेफ्ट मुड़ो तो मैं अपनी कलाई का वो धागा महसूस करती. यह सुनने में बचकाना लग सकता है पर यकीन मानिये इसने मेरे दिमाग को तुरंत सिग्नल देना शुरू कर दिया.
3. निशानों को नाम देना शुरू किया : सिर्फ यह याद रखना कि एक लाल बिल्डिंग से मुड़ना है काफी नहीं था. मैंने उन निशानों के साथ कोई कहानी जोड़ दी. जैसे कि उस बड़े नीम के पेड़ के पास से जहां कल एक कुत्ता सो रहा था वहां से राइट लेना है. ये विजुअल मेमोरी दिमाग में पक्की तरह छप जाती है.
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4. रिवर्स इंजीनियरिंग का कमाल : वापस आते वक्त रास्ता अक्सर बदला हुआ लगता है. मैंने जाते समय हर बड़े मोड़ पर रुककर एक बार पीछे मुड़कर देखा कि वह रास्ता वापस आते वक्त कैसा दिखेगा. इससे लौटते समय मुझे रास्ता अनजान नहीं लगा.
5. शॉर्टकट से तौबा की : 21 दिनों तक मैंने सिर्फ मेन सड़कों का इस्तेमाल किया. जब आप बड़े रास्तों को जान लेती हैं तो आपका दिमाग उस शहर का एक ढांचा बना लेता है. गलियों में घुसने से कन्फ्यूजन बढ़ता है इसलिए पहले बड़े रास्तों पर अपनी पकड़ बनायें.
6. खुद से बात करना शुरू किया : ड्राइव करते समय मैं जोर से बोलती थी जैसे कि अब मैं सीधे जा रही हूं अगले बड़े चौराहे से मुझे अपनी फेवरेट बेकरी की तरफ मुड़ना है. जब हम खुद को कमांड देते हैं तो हमारा सबकॉन्शियस माइंड ज्यादा सतर्क हो जाता है.
7. हड़बड़ी को किया बाय बाय : अक्सर हम इसलिए रास्ता भूलते हैं क्योंकि पीछे वाली गाड़ी हॉर्न मार रही होती है और हम जल्दी में गलत मोड़ ले लेते हैं. मैंने खुद को समझाया कि कोई बात नहीं अगर एक मिनट लेट हो जाये पर गलत मोड़ नहीं लेना है. शांत दिमाग बेहतर फैसले लेता है.
8. लैंडमार्क का जोड़ा बनाया : मैंने हमेशा दो निशानों को जोड़ा. जैसे कि पहले पुलिस स्टेशन आयेगा और उसके ठीक बाद वाला पेट्रोल पंप मेरा टर्निंग पॉइंट है. सिंगल निशानी कई बार मिस हो जाती है पर जोड़ा हमेशा याद रहता है.

9. अनजान रास्तों पर दिन में प्रैक्टिस : मैंने उन रास्तों पर छुट्टी वाले दिन सुबह ड्राइव की जहां मुझे अक्सर डर लगता था. खाली सड़क और दिन की रोशनी में आपका कॉन्फिडेंस बढ़ता है. जब एक बार रास्ता समझ आ जाये तो फिर रात में भी दिक्कत नहीं होती.
10. दूसरों से पूछने का सही तरीका : अगर मैं रास्ता भटक भी गई तो मैंने घबराने के बजाय किसी दुकानदार से पूछा. ऑटो वाले या रेहड़ी वाले रास्तों के पक्के उस्ताद होते हैं. बस उनसे पूछते समय भी अपने मैप को ऑन रखिये ताकि आप क्रॉस चेक कर सकें.
आज 21 दिन बाद मैं यह गर्व से कह सकती हूं कि अब मेरा कोई मजाक नहीं उड़ाता. अब मैं खुद दूसरों को रास्ता बताती हूं. यह सब सिर्फ प्रैक्टिस और अपनी सोचने की आदत को थोड़ा बदलने से हुआ है. अगर मैं कर सकती हूं तो कोई भी कर सकता है.
(नोट : पुनीत अपनी असली पहचान साझा नहीं करना चाहतीं, इसलिए उनकी सभी तस्वीरें प्रतीकात्मक हैं और एआई से बनवाई गई हैं.)
अस्वीकरण : यह जानकारी पूरी तरह से हमारे पाठक के नीजि अनुभवों पर आधारित है.
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