Kids Mobile Addiction: अमेरिका की अदालत में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ एक बड़ा फैसला सामने आया है. कैलिफोर्निया की जूरी ने माना कि मेटा प्लेटफॉर्म और यूट्यूब अपने प्लेटफॉर्म के लत लगाने वाले डिजाइन के कारण एक युवती केसी को मानसिक नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हैं. अदालत ने दोनों कंपनियों को 30 लाख डॉलर (करीब 25 करोड़ रुपये) का मुआवजा देने का आदेश दिया. इस फैसले ने हजारों लंबित मामलों को मजबूती दी है, जहां यूजर्स ने दावा किया है कि सोशल मीडिया के कारण उनकी मानसिक सेहत बिगड़ी. इससे पहले New Mexico में भी मेटा पर करीब 3500 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था, क्योंकि उसके प्लेटफॉर्म नाबालिगों के लिए हानिकारक पाए गए.
केसी ने बताया कि उसने 6 साल की उम्र में यूट्यूब और 9 साल में इंस्टाग्राम इस्तेमाल करना शुरू किया. लगातार इस्तेमाल के कारण उसका आत्मविश्वास गिरा, दोस्ती में मुश्किलें आईं और वह खुद की तुलना दूसरों से करने लगी.
इंस्टा और यूट्यूब बच्चों को कैसे बना रहे हैं एडिक्ट? | How Are Insta and YouTube Making Children Addicted?
सोशल मीडिया ऐप्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि यूजर ज्यादा से ज्यादा समय तक जुड़े रहें और यही बच्चों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता है.

अनंत स्क्रॉलिंग और ऑटोप्ले फीचर (Infinite Scroll and Autoplay Feature)
बिना रुके चलने वाला कंटेंट बच्चों को बस एक और वीडियो देखने के लिए मजबूर करता है. दिमाग को ब्रेक नहीं मिलता, जिससे समय का अंदाजा खत्म हो जाता है. इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स में कंटेंट कभी खत्म नहीं होता.
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की एक रिसर्च बताती है कि अनंत स्क्रॉलिंग, ऑटोप्ले और शॉट्स वीडियो एक कंटिन्यू लूप बनाते हैं, जिससे यूजर बार-बार स्क्रीन पर बना रहता है. यही कारण है कि बच्चे मोबाइल छोड़ने के नाम नहीं लेते हैं.
डोपामिन ट्रिगर (Likes और Notifications)
इंस्टाग्राम पर लाइक्स और कमेंट्स बच्चों के दिमाग में रिवार्ड सिस्टम एक्टिव करते हैं, जिससे बार-बार ऐप चेक करने की आदत बनती है. ऐप्स AI से वही कंटेंट दिखाते हैं जो बच्चे को पसंद आता है. जब बच्चे लाइक, कमेंट या नया वीडियो देखते हैं, तो दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, यही केमिकल खुशी देता है.
एक रिसर्च के अनुसार सोशल मीडिया का इस्तेमाल दिमाग के रिवार्ड सिस्टम को एक्टिव करता है और बार-बार इस्तेमाल की आदत बनाता है. दूसरी स्टडी बताती है कि यह डोपामिन इंबैलेंस पैदा करता है, जिससे सेल्फ कंट्रोल कम होता है. यानि बच्चा हर बार ऐप खोलकर वही खुशी फिर से पाना चाहता है, यहीं से लत शुरू होती है.
एल्गोरिदम का जाल (Trap of Algorithms)
AI एल्गोरिदम यूजर की पसंद समझकर वही कंटेंट बार-बार दिखाते हैं, जिससे बच्चे एक ही तरह के कंटेंट में फंस जाते हैं. एक अध्ययन में पाया गया कि प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम इगेजमेंट बढ़ाने के लिए डिजाइन होते हैं, जो कंपल्सिव बिहेवियर (बार-बार इस्तेमाल) को बढ़ाते हैं. दूसरी रिसर्च में दिखा कि छोटे बच्चों के अकाउंट को कुछ ही मिनटों में हार्मफुल कंटेंट भी दिखने लगता है. यानि बच्चा उसी कंटेंट में फंस जाता है और बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है.

मोबाइल की लत के बच्चों पर पड़ने वाले साइडइफेक्ट्स | Side Effects of Mobile Addiction on Children
1. सोशल तुलना (Comparison Trap)
सोशल मीडिया पर दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर बच्चे खुद को कमतर समझने लगते हैं, जिससे मानसिक दबाव बढ़ता है. धीरे-धीरे ये तनाव और डिप्रेशन में बदल सकता है. Pew Research Center (2023) की एक रिपोर्ट कहता है कि 46% अमेरिकी किशोरों ने माना कि वे सोशल मीडिया के लगभग लगातार यूजर हैं. 1 में से 5 बच्चों ने कहा कि वे इसे कंट्रोल नहीं कर पाते.
2. मानसिक स्वास्थ्य पर असर (Anxiety, Depression)
4000 किशोरों पर नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की एक स्टडी में पाया गया कि ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों में डिप्रेशन और एंजायटी ज्यादा थी. कई रिसर्च बताती हैं कि बहुत ज्यादा से आत्म सम्मान गिरता है और सोशल आइसोलेशन बढ़ता है. यानि बच्चा सिर्फ एडिक्टेड ही नहीं होता, बल्कि मानसिक रूप से भी कमजोर होने लगता है. अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने कहा है कि ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले बच्चों में एंग्जायटी और डिप्रेशन के लक्षण ज्यादा पाए गए. लगातार नोटिफिकेशन और तुलना मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है.
JAMA Pediatrics (2022 स्टडी) कहती है कि जो बच्चे रोज 3 घंटे से ज्यादा घंटे सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं, उनमें मानसिक समस्याओं का जोखिम 2 गुना तक बढ़ जाता है.
3. ध्यान और दिमाग पर असर (Attention and Control Loss)
शॉट्स वीडियो और रील्स दिमाग को जल्दी-जल्दी बदलते कंटेंट का आदी बना देते हैं. एक स्टडी के अनुसार शॉट्स वीडियो एडिक्शन सेल्फ कंट्रोल कम करता है और ध्यान (attention span) कमजोर करता है. यानि बच्चे पढ़ाई या किसी एक काम पर ध्यान नहीं लगा पाते.

दिन में कितने घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं बच्चे?
कॉमन सेंस मीडिया रिपोर्ट (Common Sense Media Report (2021) की रपोर्ट के अनुसार, 8-12 साल के बच्चे औसतन 5 घंटे/दिन स्क्रीन पर बिताते हैं. जबकि 13-18 साल के बच्चे 8 घंटे/दिन तक सोशल मीडिया यूज करते हैं.
क्यों खतरनाक है ये ट्रेंड?
इन स्टडीज से साफ है कि सोशल मीडिया सिर्फ टाइम पास नहीं रहा, यह बच्चों के दिमाग, व्यवहार और आत्मसम्मान को बदल रहा है. खासकर कम उम्र में शुरू हुआ इस्तेमाल ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है, क्योंकि उस समय दिमाग तेजी से विकसित हो रहा होता है.
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