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ऊंचाई पर बने हैं ज्‍यादातर राजस्‍थानी क‍िले, भीषण गर्मी में आज भी इतने ठंडे कैसे?

Rajasthan Hill Forts Secrets: चिललिती गर्मी में अगर कुछ पल के लिए भी बिजली चली जाए तो जीना ही मुश्किल हो जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पहले जब बिजली नहीं होती थी, तब राजा-महाराजों के महल इतने ठंडे कैसे होते थे. इस आर्टिकल में जानें वो सीक्रेट.

ऊंचाई पर बने हैं ज्‍यादातर राजस्‍थानी क‍िले, भीषण गर्मी में आज भी इतने ठंडे कैसे?
Natural Cooling Old Forts: एसी-कूलर सब फेल! तपती गर्मी में भी बर्फ की तरह ठंडे रहते हैं राजस्थान के ये किले. (AI Generated Image)

How Rajasthan Forts Stay Cool: तपती धूप, रेतीले धोरे और भयंकर गर्मी से सबसे पहले एक नाम याद आता है वो है राजस्थान का. मई-जून के महीने में यहां पारा 45 से 50 डिग्री को छूने लगता है. ऐसे में आम इंसान का घरों से निकलना मुश्किल हो जाता है. लोग घरों में एसी और कूलर चलाकर बैठते हैं, फिर भी चैन नहीं मिलता. ​लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आज से सैकड़ों साल पहले, जब न बिजली थी और ना ही कोई कूलर-एसी, तब राजस्थान के राजा-महाराजा इस भयंकर गर्मी में कैसे रहते थे? राजस्थान के ज्यादातर मशहूर किले, जैसे चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, आमेर और मेहरानगढ़, ऊंचे पहाड़ों या पहाड़ियों पर बने हैं. ऊंचाई पर होने के बाद भी ये किले अंदर से इतने ठंडे कैसे रहते हैं कि आज भी वहां जाने पर आपको गर्मी का अहसास नहीं होता? ​आइए बिल्कुल आसान शब्दों में समझते हैं.

पहले के महल क्यों होते थे ठंडे- (Rajasthan Hill Forts Secrets)

​1. दीवारों की मोटाई- 

​आजकल हमारे घरों की दीवारें मुश्किल से 9 या 12 इंच की होती हैं, जो धूप पड़ते ही तुरंत गर्म हो जाती हैं. लेकिन राजस्थान के किलों की दीवारें कई फीट चौड़ी (कही-कहीं तो 10 से 15 फीट तक मोटी) होती थीं. इन्हें बनाने में चूना, पत्थर, और खास तरह के गारे का इस्तेमाल किया जाता था. चूना गर्मी को सोख लेता है और अंदर नहीं जाने देता. इतनी मोटी दीवार होने की वजह से बाहर की भयंकर धूप और हीट वेव चाहकर भी अंदर के कमरों तक नहीं पहुंच पाती थी.

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​2. हवा का रास्ता- 

​राजस्थान के महलों में आपने सुंदर नक्काशीदार खिड़कियां और झरोखे देखे होंगे. ये सिर्फ खूबसूरती के लिए नहीं थे, बल्कि यह उस जमाने का 'वेंटिलेशन सिस्टम' था. इन जालीदार खिड़कियों को इस तरह डिजाइन किया जाता था कि जब बाहर की गर्म हवा इनके छोटे-छोटे छेदों से होकर गुजरती थी, तो हवा का दबाव (Pressure) बदल जाता था. 

​3. पानी- 

​राजा-महाराजाओं को पानी की कीमत अच्छे से पता थी. किलों के अंदर बड़े-बड़े तालाब, बावड़ियां और फाउंटेन बनाए जाते थे. कई महलों में तो दीवारों के बीच में से पानी बहने का रास्ता बनाया जाता था. जब झरोखों से आने वाली हवा इन पानी के स्रोतों के ऊपर से गुजरती थी, तो वो एकदम ठंडी हो जाती थी. यह बिल्कुल वैसे ही काम करता था, जैसे आज का हमारा कूलर काम करता है. 

​4. दिशा का ज्ञान-

​उस जमाने के कारीगरों को दिशाओं का बहुत अच्छा ज्ञान था. किलों के मुख्य कमरों और राजा के बैठने की जगहों को इस तरह बनाया जाता था कि वहां सीधे धूप न पड़े. महलों के बीच में एक बड़ा खुला आंगन (Courtyard) होता था. दिनभर की गर्म हवा इस आंगन के रास्ते ऊपर आसमान में निकल जाती थी और नीचे का हिस्सा हमेशा ठंडा बना रहता था.

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