90s के बच्चों का बचपन आज की पीढ़ी से बिल्कुल अलग था. उस दौर में न स्मार्टफोन थे, न इंस्टाग्राम रील्स और न ही ऑनलाइन गेम्स का शोर. फिर भी हर दिन किसी नए रोमांच से भरा होता था. स्कूल से घर लौटते ही मोहल्ले की गलियों में क्रिकेट शुरू हो जाता था, पसंदीदा गाने सुनने के लिए ऑडियो कैसेट चलती थी और घर से बाहर फोन करना हो तो पीसीओ ही सबसे बड़ा सहारा होता था. वक्त बदलने के साथ इनमें से कई चीजें हमारी जिंदगी से लगभग गायब हो गईं, लेकिन उनकी यादें आज भी 90s के बच्चों के चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं. आइए याद करते हैं उस दौर की ऐसी ही कुछ चीजों को.
PCO की लाइन और STD कॉल
मोबाइल फोन हर किसी के पास नहीं होते थे. रिश्तेदारों से बात करनी हो या किसी जरूरी काम के लिए कॉल करनी हो, तो PCO का रुख करना पड़ता था. कई बार अपनी बारी आने तक लंबा इंतजार भी करना पड़ता था.
ग्रीटिंग कार्ड भेजने का दौर
जन्मदिन, नया साल या दिवाली... हर खास मौके पर ग्रीटिंग कार्ड भेजने का अलग ही चलन था. कार्ड चुनने से लेकर उसमें अपने हाथ से संदेश लिखने तक का अपना ही मजा था.
कॉमिक्स का अलग ही क्रेज
चाचा चौधरी, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, बिल्लू और पिंकी जैसे किरदार सिर्फ कॉमिक्स के किरदार नहीं थे, बल्कि बचपन के साथी थे. नई कॉमिक हाथ लगते ही उसे एक ही दिन में खत्म कर देना आम बात थी.
वीडियो लाइब्रेरी से वीसीआर कैसेट लाना
वीकेंड पर वीडियो लाइब्रेरी से फिल्म की वीसीआर कैसेट किराये पर लाना भी एक छोटा-सा उत्सव होता था. पूरा परिवार साथ बैठकर फिल्म देखता था और अगले दिन समय पर कैसेट लौटाना भी याद रखना पड़ता था.
शाम होते ही मोहल्ले का क्रिकेट
न किसी को लोकेशन शेयर करनी पड़ती थी और न ही व्हाट्सऐप ग्रुप बनता था. शाम होते ही बच्चे खुद-ब-खुद मैदान या गली में पहुंच जाते थे. ईंटों से विकेट बनते थे और अंधेरा होने तक मैच चलता था.
दूरदर्शन के कार्यक्रम का इंतजार
रामायण, महाभारत, शक्तिमान, जंगल बुक और चंद्रकांता जैसे कार्यक्रमों का लोग बेसब्री से इंतजार करते थे. मनपसंद कार्यक्रम देखने के लिए तय समय पर टीवी के सामने बैठना पड़ता था. अगर एपिसोड छूट गया, तो फिर अगले हफ्ते तक इंतजार करना ही एकमात्र विकल्प था.
ऑडियो कैसेट और वॉकमैन
नए गाने सुनने का मतलब था नई कैसेट खरीदना. कई लोग अपने पसंदीदा गानों की मिक्स कैसेट भी बनवाते थे. अगर किसी के पास वॉकमैन होता था, तो वह दोस्तों के बीच किसी स्टार से कम नहीं माना जाता था.
वीडियो गेम की कैसेट
मारियो, कॉन्ट्रा, टैंक और डक हंट जैसे गेम्स 90s के बच्चों के बचपन का अहम हिस्सा थे. '999999 इन 1' लिखी पीली कैसेट देखकर ही खेलने का मन खुश हो जाता था, चाहे उसमें वही पुराने गेम क्यों न हों.
पेंसिल से कैसेट रिवाइंड करना
अगर कैसेट का टेप बाहर निकल आए या उसे जल्दी रिवाइंड करना हो, तो पेंसिल सबसे बड़ा जुगाड़ होती थी. धीरे-धीरे पेंसिल घुमाकर टेप को वापस लपेटना उस दौर के लगभग हर बच्चे ने किया होगा. आज म्यूजिक एक क्लिक पर मिल जाता है, लेकिन उस जुगाड़ का मजा कुछ और ही था.
फैंटम और मेलोडी का स्वाद
स्कूल के बाहर मिलने वाली फैंटम स्वीट सिगरेट, मेलोडी, बिग बबल और पॉपिन्स जैसी टॉफियां उस दौर की खास पहचान थीं. जेब में कुछ रुपये हों, तो ये छोटी-छोटी खुशियां आसानी से मिल जाती थीं.
आज तकनीक ने जिंदगी को पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है, लेकिन 90s के दौर की ये छोटी-छोटी बातें आज भी लोगों की यादों में जिंदा हैं. शायद यही वजह है कि उस दौर का जिक्र होते ही लोग मुस्कुराकर कहते हैं, "वो बचपन सच में अलग था."
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