- सबरीमला मामले की सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत ने न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर अहम टिप्पणी की
- न्यायालय ने माना कि धार्मिक प्रथाएं पूरी तरह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं हैं और उनकी समीक्षा संभव है
- वकील ने तर्क दिया कि धार्मिक प्रथा को कानून में संहिताबद्ध करने से वह न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं हो जाती
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मामले पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर “इतना हमला करने की जरूरत नहीं है”, क्योंकि अदालत अपनी सीमाओं को समझती है. हालांकि, यह कहना भी सही नहीं होगा कि इस मामले में अदालत के पास कोई शक्ति ही नहीं है.
कोर्ट की सीमाएं हैं, लेकिन शक्ति पर सवाल उठाना गलत
सीजेआई कांत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर इतना आक्रमण होने की जरूरत नहीं है. हम जानते हैं कि सीमाएं हैं, लेकिन यह कहना कि कोई शक्ति ही नहीं है, यह भी स्वीकार करना कठिन होगा. उन्होंने कहा कि यह परिस्थिति पर निर्भर करेगा. अदालत ने यह भी कहा कि यह मानना मुश्किल है कि धार्मिक प्रथाएं पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से बाहर हैं.
सुप्रीम कोर्ट में वकील जे साईं दीपक की दलील
कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर सामाजिक सुधार के नाम पर किसी प्रथा को कानून द्वारा प्रतिबंधित किया जाता है, तो उसकी वैधता की जांच कौन करेगा? यह टिप्पणी उस समय आई जब वरिष्ठ वकील जे साईं दीपक ने दलील दी कि यदि कोई पहले से मौजूद धार्मिक प्रथा को राज्य कानून के जरिए संहिताबद्ध कर देता है, तो वह अपने आप न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आ जाती.
9 जजों की संविधान पीठ कर रही सबरीमाला मामले की सुनवाई
उन्होंने कहा कि इस मुद्दे के मूल में संविधान के अनुच्छेद 25 (विशेष रूप से अनुच्छेद 25(1) और 25(2)) का सवाल आता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य के हस्तक्षेप के बीच संतुलन तय करता है. अदालत ने संकेत दिया कि इस तरह के संवैधानिक सवालों का उत्तर परिस्थितियों और मामले के तथ्यों के आधार पर ही तय किया जाएगा. बता दें कि सबरीमाला मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ कर रही है.
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